लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए कांग्रेस ने एक बड़ा दांव खेला है। साढ़े तीन दशक से राज्य की सत्ता से बाहर चल रही पार्टी ने अब दलित राजनीति के एक प्रखर चेहरे, राजेन्द्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने यह कदम आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उठाया है। अविनाश पाण्डेय को हटाकर गौतम को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसे कांग्रेस की अनुसूचित जाति के मतदाताओं को रिझाने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
राजेन्द्र पाल गौतम की नियुक्ति राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि तकरीबन तीन दशक बाद कांग्रेस ने किसी दलित नेता को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। इससे पहले नब्बे के दशक में वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे को यह प्रभार सौंपा गया था, जिसके बाद से लगातार सवर्ण या मुस्लिम नेता ही इस पद पर काबिज रहे। राजेन्द्र पाल गौतम वर्तमान में कांग्रेस के अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और वे अंबेडकरवादी विचारधारा व सामाजिक न्याय की आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते हैं।
बसपा और आम आदमी पार्टी का रहा है अनुभव
राजेन्द्र पाल गौतम का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ की थी। बाद में वे आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हुए और दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद पर भी रहे। हालांकि, एक धार्मिक विवाद में उनकी टिप्पणी के बाद उन्हें मंत्री पद से हटना पड़ा था और बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश जैसा महत्वपूर्ण राज्य सौंपा है।
गौतम की नियुक्ति के मायने और भविष्य की रणनीति
कांग्रेस द्वारा राजेन्द्र पाल गौतम को प्रभारी बनाए जाने के पीछे कई अहम कारण माने जा रहे हैं:
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दलित मतदाताओं पर पकड़: मायावती की बसपा के कमजोर पड़ने के बाद कांग्रेस की नजर राज्य के बड़े दलित वोट बैंक पर है।
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सपा के साथ तालमेल: पूर्व प्रभारी अविनाश पाण्डेय के कार्यकाल में सपा के साथ गठबंधन सफल रहा था, लेकिन अब पार्टी विधानसभा चुनाव के लिए नए सिरे से गोटियां सेट करना चाहती है।
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मायावती से नजदीकी: पिछले महीने गौतम ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलने का प्रयास किया था। हालांकि मुलाकात नहीं हुई, लेकिन इसे भविष्य में कांग्रेस-बसपा गठबंधन की संभावनाओं के तौर पर देखा जा रहा है।
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संगठनात्मक बदलाव: अविनाश पाण्डेय का क्षेत्रीय अध्यक्षों के साथ तालमेल ठीक न होने की शिकायतों के बाद गौतम को संगठन में नई ऊर्जा फूंकने की जिम्मेदारी दी गई है।
प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को बदलने की भी चर्चा
प्रभारी में बदलाव के साथ ही अब प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। वर्तमान अध्यक्ष अजय राय भूमिहार समाज से आते हैं। चर्चा है कि पार्टी जातीय संतुलन साधने के लिए आराधना मिश्र ‘मोना’ या सीतापुर के सांसद राकेश राठौर जैसे नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंप सकती है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पकड़ रखने वाले सांसद इमरान मसूद को भी संगठन में कोई बड़ा पद मिल सकता है।
कांग्रेस इस समय भाजपा के खिलाफ संविधान और आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है। राजेन्द्र पाल गौतम जैसे चेहरे के जरिए पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह दलितों और पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रहे गौतम उत्तर प्रदेश की पेचीदा सियासी पिच पर कांग्रेस को कितनी मजबूती दिला पाते हैं और क्या वे मायावती को गठबंधन की मेज पर लाने में सफल होते हैं।
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