अमृतसर। उत्तराखंड के निवासी आशीष नेगी द्वारा सोशल मीडिया पर दिए गए एक कथित विवादित बयान ने सिख समुदाय के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इस संवेदनशील मुद्दे पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने कड़ा रुख अपनाया है। संगठन के पूर्व महासचिव और वरिष्ठ सदस्य गुरचरण सिंह ग्रेवाल ने इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए सरकार से आरोपी के खिलाफ तत्काल और सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। ग्रेवाल ने चेतावनी दी कि इस तरह के भड़काऊ बयान समाज की शांति और भाईचारे को भंग करने की एक गहरी साजिश का हिस्सा हैं।
एसजीपीसी नेता ने कहा कि जून 1984 में श्री दरबार साहिब पर की गई सैन्य कार्रवाई सिख इतिहास का एक अत्यंत दुखद और काला अध्याय है। इस विषय पर किसी भी प्रकार की अपमानजनक टिप्पणी करना न केवल सिख भावनाओं को ठेस पहुँचाना है, बल्कि यह जानबूझकर एक समुदाय को उकसाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि सिख समुदाय ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना के साथ हमेशा शांति और भाईचारे का पक्षधर रहा है, लेकिन बार-बार समुदाय को निशाना बनाने की कोशिशों को अब सहन नहीं किया जाएगा।
छवि खराब करने की सुनियोजित साजिश
गुरचरण सिंह ग्रेवाल ने आशंका व्यक्त की है कि कुछ असामाजिक तत्व जानबूझकर सिख समुदाय की छवि को धूमिल करने के लिए ऐसे विभाजनकारी बयानों का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि इस मामले की तह तक जाकर जांच की जाए कि क्या इसके पीछे कोई संगठित गिरोह काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्तियों को दंडित किया जाना आवश्यक है ताकि समाज में यह संदेश जाए कि किसी भी धर्म की आस्था और पवित्र प्रतीकों के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं है।
धार्मिक भावनाओं और गुरुधामों का सम्मान
ग्रेवाल ने स्पष्ट किया कि श्री हेमकुंट साहिब, तख्त श्री हजूर साहिब और अन्य गुरुधाम करोड़ों लोगों की अटूट आस्था के केंद्र हैं। इन पवित्र स्थलों या समुदाय के इतिहास के बारे में की गई कोई भी आपत्तिजनक टिप्पणी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने बताया कि इस प्रकरण में श्री अकाल तख्त साहिब के दिशा-निर्देशों के अनुसार एसजीपीसी आगामी कानूनी और सांगठनिक कदम उठाएगी।
एसजीपीसी नेता ने अंत में उन उत्तराखंड वासियों की सराहना की जिन्होंने इस नफरती बयान के खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने सभी समुदायों से अपील की कि वे ऐसी भड़काऊ भाषा से बचें और आपसी सौहार्द बनाए रखें। उन्होंने दोहराया कि सिखों के महान बलिदानों और उनकी आस्था पर प्रहार करने वालों को कानून के कटघरे में खड़ा करना समय की मांग है। इस मामले के बाद पंजाब और उत्तराखंड के बीच धार्मिक और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना प्रशासन के लिए एक चुनौती बन गया है।