नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में इजरायल द्वारा ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साउथ पार्स गैस क्षेत्र पर किए गए हमले ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर दी है। इस हमले के जवाब में ईरान ने अब इजरायल के साथ-साथ खाड़ी देशों के ऊर्जा संयंत्रों और ईधन केंद्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इस संघर्ष का सीधा असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है, जिसका बड़ा खामियाजा भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को भुगतना पड़ सकता है।
क्षेत्र में जारी इस जंग के बीच अमेरिका और इजरायल के शीर्ष नेतृत्व में भी वैचारिक दरार आती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के गंभीर मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं। ईरान के ऊर्जा संसाधनों पर हुए हमले को लेकर ट्रंप ने अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ईरान की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा संपत्ति माने जाने वाले इस गैस क्षेत्र पर इजरायली हमले के पक्ष में नहीं थे। ट्रंप के अनुसार, उन्होंने पूर्व में ही इजरायल से आग्रह किया था कि वह ऐसा कोई कदम न उठाए जिससे ऊर्जा संकट पैदा हो।
इजरायल की इस सैन्य कार्रवाई के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। ईरान की जवाबी कार्रवाई से घबराए खाड़ी देशों ने भी डोनल्ड ट्रंप से इस मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। इन देशों ने अमेरिका से आग्रह किया है कि वे बेंजामिन नेतन्याहू के कड़े फैसलों पर लगाम लगाएं ताकि क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे को सुरक्षित रखा जा सके। ओवल ऑफिस में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ हुई एक बैठक के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू के व्यवहार पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल के बीच तालमेल और समन्वय बहुत अच्छा है, लेकिन कभी-कभी नेतन्याहू कुछ ऐसा कर देते हैं जो उन्हें पसंद नहीं आता। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि उन्होंने इस हमले को लेकर स्पष्ट मना किया था।
दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह के टकराव की खबरों को नकार दिया है। इजरायली प्रधानमंत्री ने स्थिति को संभालने की कोशिश करते हुए कहा कि इजरायल ने भविष्य में ईरान के गैस क्षेत्रों पर दोबारा हमले न करने के डोनल्ड ट्रंप के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए जानकारों का मानना है कि इस हमले ने मिडिल ईस्ट में सुरक्षा के समीकरणों को काफी पेचीदा बना दिया है। यदि ईरान के जवाबी हमले इसी प्रकार जारी रहते हैं, तो पूरी दुनिया में एक गंभीर ऊर्जा संकट पैदा होने की आशंका बढ़ जाएगी।
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