देहरादून। हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता और भविष्य के सुरक्षित विकास को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आगाज हुआ है। उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (यूएलएमएमसी) द्वारा आयोजित यह पांच दिवसीय कार्यशाला हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में आपदा-सक्षम विकास के विषय पर केंद्रित है। देहरादून के सुद्धोवाला स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण एवं वित्तीय प्रशासन अनुसंधान संस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम में देश-विदेश के जाने-माने वैज्ञानिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ जुटे हैं, जो आने वाले पांच दिनों तक भूस्खलन के जोखिमों को कम करने की रणनीतियों पर चर्चा करेंगे।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने हिमालयी क्षेत्र की जटिलताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से दुनिया के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक है। यहाँ भारी वर्षा, भूकंपीय गतिविधियों और भूस्खलन जैसी आपदाओं का खतरा सदैव बना रहता है, जो न केवल जनजीवन को प्रभावित करता है बल्कि राज्य की बुनियादी संरचना को भी भारी नुकसान पहुँचाता है। विनोद कुमार सुमन ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न विभागों की तकनीकी क्षमताओं को मजबूत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार का मुख्य लक्ष्य सड़कों, पुलों और जलापूर्ति जैसी अनिवार्य सेवाओं के लिए ऐसे इंजीनियरिंग समाधान ढूंढना है जो लंबे समय तक टिक सकें और आपदाओं के प्रति लचीले हों।
कार्यशाला के दौरान नॉर्वे के भू-तकनीकी अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञों ने तकनीकी सत्रों का संचालन किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त भूस्खलन विशेषज्ञ हाकोन हेयर्डल, जिनके पास इस क्षेत्र में 32 वर्षों का अनुभव है, ने हिमालयी ढलानों की स्थिरता पर विशेष जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि हिमालय में भूस्खलन का व्यवहार लगातार बदलता रहता है, इसलिए केवल पुराने तरीकों से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता। हाकोन हेयर्डल ने ढलान स्थिरता, मृदा सुदृढ़ीकरण, सॉइल नेलिंग और जल निकासी के वैज्ञानिक उपायों के साथ-साथ उपग्रह आधारित तकनीकों के उपयोग को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभवों को साझा करना और एक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करना ही इस क्षेत्र में सुरक्षित विकास की कुंजी है।
विश्व बैंक के प्रतिनिधि अनुप करण्थ ने भी उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा के बाद से ही विश्व बैंक राज्य में पुनर्बहाली और जोखिम प्रबंधन के लिए लगातार सहयोग कर रहा है। उन्होंने बताया कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से संस्थागत क्षमता का निर्माण होता है, जो किसी भी बड़ी आपदा के समय त्वरित और प्रभावी कार्रवाई में सहायक होता है। विश्व बैंक उत्तराखंड में आपदा तैयारियों को वैश्विक मानकों के अनुरूप ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।
कार्यशाला के पहले चरण में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक अध्ययन पर भी ध्यान दिया गया। प्रतिभागियों को हरिद्वार स्थित मनसा देवी भूस्खलन क्षेत्र का क्षेत्रीय भ्रमण कराया गया। इस दौरान विशेषज्ञों ने वास्तविक परिस्थितियों में जोखिम का विश्लेषण किया और वहां अपनाए गए न्यूनीकरण उपायों के बारे में जानकारी दी। स्थानीय स्तर पर पूर्व चेतावनी प्रणालियों का व्यावहारिक अध्ययन किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि घनी आबादी वाले और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जोखिम को कैसे न्यूनतम किया जा सकता है।
इस पांच दिवसीय आयोजन में केवल भारत ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल और भूटान के तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल हुए हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसे प्रमुख संस्थानों के अधिकारियों ने भी शिरकत की। लोक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग जैसे रेखीय विभागों के अभियंताओं को भी इसमें शामिल किया गया है ताकि वे सड़कों और अन्य निर्माण कार्यों के दौरान भूस्खलन के कारकों को ध्यान में रख सकें।
इस कार्यक्रम के उद्देश्यों को विस्तार से समझाते हुए यूएलएमएमसी के निदेशक शांतनु सरकार, संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओबैदुल्लाह अंसारी और प्रमुख सलाहकार मोहित पूनिया ने बताया कि इसका मुख्य लक्ष्य आपदा जोखिम प्रबंधन को विभागीय स्तर पर आत्मसात करना है। कार्यशाला के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि भविष्य में होने वाले सभी निर्माण कार्य, विशेषकर सड़क और पुल, वैज्ञानिक रूप से स्वीकृत मानकीकृत विधियों पर आधारित हों।
मंथन के दौरान यह बात उभरकर आई कि आपदाओं से लड़ने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय और आपसी सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उपग्रह आधारित डेटा और भू-स्थानिक आंकड़ों का उपयोग बढ़ाकर जोखिम मानचित्रण को अधिक सटीक बनाने पर सहमति बनी। साथ ही, समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने और स्थानीय स्तर पर लोगों को पूर्व चेतावनी प्रणाली से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। यह कार्यक्रम 06 फरवरी 2026 तक जारी रहेगा, जिसमें भूस्खलन न्यूनीकरण की अत्याधुनिक तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ‘बेस्ट प्रैक्टिस’ पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा।