Uttarakhand: 16वें वित्त आयोग की नई सिफारिशों से उत्तराखंड के वित्तीय गणित में बड़ा बदलाव तीस हजार करोड़ की सहायता पर संकट – The Hill News

Uttarakhand: 16वें वित्त आयोग की नई सिफारिशों से उत्तराखंड के वित्तीय गणित में बड़ा बदलाव तीस हजार करोड़ की सहायता पर संकट

देहरादून। उत्तराखंड को आगामी पांच वर्षों के दौरान केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता के मामले में एक बड़े बदलाव का सामना करना पड़ेगा। 16वें वित्त आयोग की हालिया रिपोर्ट के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राज्य को लगभग 30 हजार करोड़ रुपये की वह सहायता अब उपलब्ध नहीं होगी, जो उसे पिछले वर्षों में मिलती रही थी। आयोग ने अपनी नई सिफारिशों में राजस्व घाटा अनुदान और राज्य विशिष्ट अनुदान को स्थान नहीं दिया है, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। हालांकि, केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि की गई है, लेकिन यह घाटे की तुलना में काफी कम है।

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई व्यवस्था के कारण उत्तराखंड को अब अपने स्वयं के संसाधनों से आय बढ़ाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। यदि राज्य अपनी आंतरिक आय बढ़ाने में सफल नहीं होता, तो उसे विकास कार्यों और वेतन-भत्तों के भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चों के लिए बार-बार बाजार से ऋण लेने पर मजबूर होना पड़ेगा। यह स्थिति राज्य के वार्षिक बजट के ढांचे और उसके आकार को भी प्रभावित कर सकती है। आयोग की ये संस्तुतियां 1 अप्रैल 2026 से अगले पांच वर्षों यानी 2031 तक के लिए प्रभावी होंगी।

अगर पिछले 15वें वित्त आयोग की तुलना 16वें आयोग से की जाए, तो अंतर काफी बड़ा नजर आता है। 15वें वित्त आयोग ने वर्ष 2021 से 2026 की अवधि के लिए उत्तराखंड को राजस्व घाटा अनुदान के रूप में कुल 28,147 करोड़ रुपये की संस्तुति की थी। इसके तहत राज्य को वर्ष 2021-22 में 7,772 करोड़, 2022-23 में 7,137 करोड़, 2023-24 में 6,223 करोड़, 2024-25 में 4,916 करोड़ और चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 में 2,099 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, राज्य की विशेष जरूरतों के लिए 1,600 करोड़ रुपये का विशिष्ट अनुदान भी दिया गया था। इन दोनों मदों को मिलाकर यह राशि लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के करीब बैठती है, जिससे राज्य अब वंचित रहेगा।

इतना ही नहीं, आपदा प्रबंधन मद में भी राज्य को मिलने वाली धनराशि में कटौती की गई है। 16वें वित्त आयोग ने इस बार आपदा प्रबंधन के लिए निर्धारित कुल कोष में 224 करोड़ रुपये की कमी कर दी है। इस प्रकार, राजस्व घाटा अनुदान, विशिष्ट अनुदान और आपदा मद में कटौती को जोड़ दिया जाए, तो राज्य को अगले पांच वर्षों में 30 हजार करोड़ से अधिक की आर्थिक चपत लगने वाली है।

हालांकि, इस रिपोर्ट में कुछ राहत की खबरें भी छिपी हैं। 16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों में उत्तराखंड की हिस्सेदारी को 0.02 प्रतिशत बढ़ा दिया है। इस सूक्ष्म वृद्धि का लाभ यह होगा कि अगले पांच वर्षों में राज्य को इस मद में लगभग 9,200 करोड़ रुपये अतिरिक्त प्राप्त होंगे। वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले ही साल में राज्य को करीब 1,841.16 करोड़ रुपये बढ़कर मिलेंगे और यह राशि प्रतिवर्ष बढ़ती जाएगी। लेकिन करों में हुई इस वृद्धि और 30 हजार करोड़ के नुकसान के बीच अभी भी 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का एक बड़ा अंतर बना हुआ है, जिसकी पूर्ति करना राज्य प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

वित्त सचिव दिलीप जावलकर ने इस स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी का बढ़ना उत्तराखंड के सुदृढ़ आर्थिक प्रदर्शन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता का परिणाम है। उनके अनुसार, राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय अनुशासन पर कड़ाई से काम किया है और अपने आंतरिक संसाधनों से आय जुटाने के प्रयासों को गति दी है। उन्होंने बताया कि राज्य की स्वयं की आय पिछले पांच वर्षों में डेढ़ गुना से अधिक बढ़ी है और उत्तराखंड लगातार छह वर्षों से राजस्व सरप्लस की स्थिति में बना हुआ है। यह सकारात्मक प्रदर्शन ही है जिसके कारण आयोग ने क्षैतिज हस्तांतरण के सूत्र में उत्तराखंड की हिस्सेदारी बढ़ाई है।

राज्य की राजस्व प्राप्ति के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2019-20 में यह 30,722 करोड़ रुपये थी, जो 2024-25 में बढ़कर 51,473 करोड़ रुपये तक पहुँच गई है। प्रशासन का मानना है कि फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाकर और कर चोरी को रोककर राज्य अपनी आय को और अधिक बढ़ाने में सक्षम होगा। दिलीप जावलकर ने यह भी रेखांकित किया कि शहरी निकायों और पंचायतों के लिए मिलने वाले अनुदान में भी इस बार बड़ी वृद्धि की गई है, जो स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति देगी।

निष्कर्ष के तौर पर, 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों ने उत्तराखंड को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक कड़ा संदेश दिया है। अब राज्य को केवल केंद्रीय अनुदानों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आर्थिक नीतियों में और अधिक सुधार करना होगा। वन संरक्षण और प्रभावी जनसांख्यिकीय प्रदर्शन जैसे मानकों पर मिली पहचान ने राज्य का मान बढ़ाया है, लेकिन वित्तीय अंतर को पाटने के लिए आने वाले पांच साल उत्तराखंड की आर्थिक नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। राज्य सरकार अब इस दिशा में मंथन कर रही है कि विकास की गति को थामे बिना संसाधनों का अधिकतम उपयोग कैसे सुनिश्चित किया जाए।

 

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