धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने प्रदेश की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि प्रदेश कर्ज के भारी बोझ तले दबता जा रहा है और विकास कार्यों पर पूरी तरह से विराम लग गया है। जयराम ठाकुर ने कहा कि राज्य की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कर्ज का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये को छू गया है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा सरकार ने महज तीन साल में 40 हजार करोड़ रुपये का कर्ज ले लिया है जबकि उनकी सरकार ने पांच साल में साढ़े 19 हजार करोड़ का ही कर्ज लिया था।
जयराम ठाकुर ने स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश का हेल्थ सिस्टम खुद वेंटिलेटर पर है। उन्होंने रामपुर की घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि एक महिला को इलाज के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि अस्पतालों में डॉक्टर ही नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सरकार के समय मिलने वाली निश्शुल्क जांच और दवाइयां अब उपलब्ध नहीं हैं और इमरजेंसी में सीरिंज तक नहीं मिल रही है। आईजीएमसी शिमला में मारपीट के प्रकरण और एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल को उन्होंने सरकार की नाकामी करार दिया।
हिमकेयर योजना के बंद होने पर दुख जताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यह योजना गरीबों के लिए वरदान थी लेकिन सरकार की नीयत लोगों का भला करने की नहीं है। उन्होंने कहा कि सहारा, शगुन और स्वावलंबन जैसी योजनाओं का बजट रोक दिया गया है जिससे लाभार्थी परेशान हैं। जयराम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का 2027 तक हिमाचल को स्वावलंबी बनाने का दावा पूरी तरह से काल्पनिक है।
राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए जयराम ने कहा कि सुक्खू के दिमाग में चौबीस घंटे सिर्फ राजनीति घूमती रहती है। उन्होंने भाजपा के गुटों में बंटे होने के आरोपों को खारिज किया और कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा एकजुट है। उल्टा उन्होंने कांग्रेस में गुटबाजी होने का दावा किया और कहा कि उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री का शीतकालीन सत्र से नदारद रहना उनकी नाराजगी को दर्शाता है।
युवाओं के रोजगार पर जयराम ने कहा कि वन मित्र या बिजली मित्र जैसी भर्तियां युवाओं के साथ धोखा हैं और सरकार को पक्की नौकरियां देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ चारों तरफ नाराजगी है और कर्मचारी से लेकर पेंशनर्स तक धरने पर बैठने को मजबूर हैं। उनका मानना है कि हिमाचल को फिर से पटरी पर लाने के लिए कड़े और बड़े फैसले लेने की जरूरत है।
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