मुंबई। मुंबई में अंडरवर्ल्ड के पुराने गिरोहों का प्रभाव कम होने के बाद हिंदी फिल्म उद्योग ने लंबे समय तक राहत महसूस की थी। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में फिल्म निर्माताओं, अभिनेताओं और संगीत जगत से जुड़े लोगों को जबरन वसूली तथा जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ता था। पुलिस की सख्ती और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई से इस खतरे पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया, लेकिन हाल की घटनाओं ने एक बार फिर फिल्मी हस्तियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर रविवार शाम मुंबई के जुहू इलाके में हुई कथित फायरिंग ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, एक स्पोर्ट्स इवेंट से निकलते समय उनकी कार को निशाना बनाया गया। घटना में अभिनेता सुरक्षित बच गए, जबकि दो लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की बात कही गई है। घटना के कुछ समय बाद लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जुड़े अनमोल बिश्नोई के सोशल मीडिया पोस्ट में हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा भी सामने आया। हालांकि, इन दावों और घटना से जुड़े तथ्यों की पुष्टि जांच एजेंसियों के निष्कर्षों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
जब बॉलीवुड पर मंडराता था अपराध का खतरा
नब्बे के दशक में मुंबई का फिल्म उद्योग संगठित अपराध के निशाने पर रहा। फिल्म निर्माण में पैसों के लेनदेन, रंगदारी और निजी रंजिशों के चलते कई चर्चित हस्तियों पर हमले हुए। वर्ष 1997 में निर्माता मुकेश दुग्गल की हत्या और संगीत कारोबारी गुलशन कुमार की दिनदहाड़े हत्या ने पूरे उद्योग को झकझोर दिया था। इसी वर्ष फिल्म निर्माता राजीव राय पर भी हमला हुआ।
वर्ष 2000 में फिल्म निर्माता राकेश रोशन पर गोलीबारी की घटना सामने आई। इसके बाद 2001 में अभिनेत्री मनीषा कोइराला के सचिव अजीत दीवानी की हत्या ने फिल्म जगत में सुरक्षा को लेकर भय बढ़ा दिया। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया था कि अपराधी गिरोह फिल्मी हस्तियों की लोकप्रियता और आर्थिक स्थिति का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर रहे थे।
पुलिस की कार्रवाई से कमजोर पड़े पुराने गिरोह
लगातार मिल रही धमकियों और हमलों के बाद मुंबई पुलिस ने संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई तेज की। महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) जैसे कानूनों के इस्तेमाल और अपराधियों के खिलाफ व्यापक अभियान से कई गिरोह कमजोर हुए। अबू सलेम को पुर्तगाल में गिरफ्तार किए जाने के बाद भारत लाया गया, जबकि छोटा राजन को 2015 में इंडोनेशिया से भारत प्रत्यर्पित किया गया। अरुण गवली के गिरोह पर भी पुलिस कार्रवाई का असर पड़ा।
इन कार्रवाइयों के बाद फिल्म उद्योग में रंगदारी और धमकियों का पुराना दौर काफी हद तक कमजोर पड़ गया। हालांकि, संगठित अपराध की चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
नए गिरोहों से बढ़ी चिंता
पिछले कुछ वर्षों में लॉरेंस बिश्नोई गिरोह का नाम फिल्मी हस्तियों और अन्य चर्चित लोगों को धमकियां दिए जाने के मामलों में सामने आया है। अभिनेता सलमान खान के आवास के बाहर गोलीबारी और अक्टूबर 2024 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई थी। फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी समेत अन्य हस्तियों को धमकियां मिलने की खबरों ने भी इस मुद्दे को चर्चा में बनाए रखा है।
टाइगर श्रॉफ से जुड़ी ताजा घटना के दावों की जांच के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिल्म उद्योग को अपराधियों के नए नेटवर्क से कैसे सुरक्षित रखा जाए। विशेषज्ञों के लिए चुनौती केवल हमलों के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि धमकियों की समय रहते पहचान करना और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना भी है। बॉलीवुड में शांति बनाए रखने के लिए पुलिस, फिल्म संगठनों और कलाकारों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
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