इस्लामाबाद। पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए कश्मीर (पीओके) में पिछले डेढ़ महीने से सुलग रही असंतोष की आग अब एक बड़े जनांदोलन और विद्रोह में तब्दील हो गई है। रावलकोट के ऐतिहासिक ईदगाह मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा में आंदोलनकारी नेता सरदार अमान खान ने पाकिस्तान के उन तमाम कूटनीतिक दावों की धज्जियां उड़ा दीं, जिनके जरिए वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस क्षेत्र को ‘आजाद’ बताता रहा है। हजारों की भीड़ के सामने उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि यह कोई विवादित क्षेत्र नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की सेना द्वारा जबरन कब्जाई गई एक गुलाम जमीन है।
सरदार अमान खान के इस बयान ने पाकिस्तान के उस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जिसे वह दशकों से पाल रहा था। रैली में मौजूद हजारों लोगों ने अमान खान की बातों का जोरदार तालियों और पाकिस्तान विरोधी नारों के साथ स्वागत किया। स्थानीय लोगों का यह गुस्सा केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले 40 दिनों से जारी भीषण प्रशासनिक प्रताड़ना और बुनियादी जरूरतों का अभाव भी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अब पाकिस्तान के झूठे वादों और दमन के साये में और अधिक नहीं रह सकते।
मानवीय संकट और भुखमरी के हालात
रावलकोट और आसपास के इलाकों में जारी यह आंदोलन अब 40 दिनों की समयसीमा पार कर चुका है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पाकिस्तानी प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए बेहद अमानवीय रास्ता अपनाया है। अमान खान ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि पिछले तीन सप्ताह से पाकिस्तानी सरकार ने इलाके में खाने-पीने की वस्तुओं, राशन और जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी है। सड़कों की नाकेबंदी के कारण यहाँ भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए दूध और दवाइयां तक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो गया है।
भारत से मदद की गुहार और एलओसी की ओर रुख
हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि अब प्रदर्शनकारी पाकिस्तान सरकार के बजाय भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। रैली के दौरान सरदार अमान खान ने सीधे तौर पर नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दूसरी तरफ रहने वाले कश्मीरी भाइयों और भारत सरकार से मदद की मार्मिक अपील की। उन्होंने कहा कि जब अपनों ने ही साथ छोड़ दिया है और भूखा मारने पर उतारू हैं, तो पड़ोसी ही एकमात्र सहारा बचता है। रैली में एक ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब अमान खान ने भीड़ से पूछा कि “क्या हमें अपनी जान बचाने के लिए अब एलओसी की तरफ बढ़ना चाहिए?” इसके जवाब में हजारों लोगों ने एक सुर में “आगे बढ़ो-आगे बढ़ो” के नारे लगाकर यह स्पष्ट कर दिया कि वे अब पाकिस्तान की गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए तैयार हैं।
सुरक्षा बलों की बर्बरता और नागरिकों की मौत
इस शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने अब हिंसा का सहारा लेना शुरू कर दिया है। हालिया जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों पर की गई अंधाधुंध गोलीबारी में छह नागरिकों की जान जा चुकी है। मृतकों में जाहिद मुगल, जफर मुगल, अर्सलान अकबर और वाजिद हयात जैसे स्थानीय लोग शामिल हैं। इन मौतों ने पूरे इलाके में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निंदा होने की संभावना है, क्योंकि निहत्थे नागरिकों पर बल प्रयोग ने पाकिस्तान के मानवाधिकारों के दावों की पोल खोल दी है।
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