अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट ने साल 2008 में हुए अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने इस जघन्य आतंकी हमले के 38 दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा है। इससे पहले अहमदाबाद की निचली अदालत (सिटी सेशंस कोर्ट) ने इन आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी, जिस पर अब हाई कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है।
गौरतलब है कि अहमदाबाद सिटी सेशंस कोर्ट ने इस मामले में कुल 49 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इनमें से 38 को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने नियमानुसार सजा की पुष्टि के लिए हाई कोर्ट में ‘कन्फर्मेशन याचिका’ दायर की थी। वहीं, दूसरी ओर सजा पाने वाले दोषियों ने भी निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। दोनों पक्षों की लंबी दलीलों और सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आज अपना निर्णय सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को उचित माना है।
13 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया
अहमदाबाद बम धमाकों का यह मामला कानूनी इतिहास के सबसे लंबे चलने वाले मुकदमों में से एक रहा है। साल 2009 में इस केस की आधिकारिक शुरुआत हुई थी और लगभग 13 साल तक इसकी सघन सुनवाई चली। आखिरकार 18 फरवरी 2022 को विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया था। सुनवाई के दौरान कुल 78 आरोपियों पर मुकदमा चलाया गया था, जिनमें से 29 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था, जबकि 49 को सजा सुनाई गई थी।
26 जुलाई 2008 का वो खौफनाक दिन
यह पूरा मामला 26 जुलाई 2008 का है, जब गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद दहल उठी थी। शहर के 20 अलग-अलग स्थानों पर मात्र 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार धमाके हुए थे। इस आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इन धमाकों में 56 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। धमाकों की योजना इतनी क्रूर थी कि अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया था, ताकि घायलों की मदद करने वालों को भी हताहत किया जा सके।
जांच और साक्ष्यों का विशाल पुलिंदा
इस मामले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों ने देशव्यापी नेटवर्क का खुलासा किया था। शुरुआती जांच में कुल 99 लोगों को संदिग्ध माना गया था, जिनमें से 82 को गिरफ्तार किया गया। ये आतंकी न केवल गुजरात बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों से भी ताल्लुक रखते थे।
अदालती कार्यवाही की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेशंस कोर्ट का फैसला ही करीब 7 हजार पन्नों का था। पूरी केस फाइल लगभग 7.88 लाख पन्नों की है। हाई कोर्ट द्वारा मौत की सजा बरकरार रखे जाने को न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला आतंकवाद के खिलाफ देश की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को मजबूती प्रदान करता है। अब दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प शेष है। फिलहाल, इस फैसले ने पीड़ित परिवारों को लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर न्याय की उम्मीद दी है।
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