शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति को ईमेल के माध्यम से केवल अपशब्द या गालियां देना तब तक आपराधिक श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि उन अपशब्दों का मुख्य उद्देश्य सामने वाले व्यक्ति को डराना-धमकाना या सार्वजनिक शांति को भंग करना न हो। यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
जस्टिस संदीप शर्मा ने डॉ. तिलक राज शर्मा की याचिका को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कहा कि यद्यपि विवादित ईमेल में इस्तेमाल की गई भाषा निस्संदेह बेहद अभद्र, अश्लील और आपत्तिजनक थी, लेकिन कानून की नजर में केवल ‘गंदी भाषा’ का प्रयोग ही किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने माना कि किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना या गलत शब्दों का चयन करना नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन आपराधिक कानून के तहत सजा दिलाने के लिए उसमें आपराधिक मंशा और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे जैसे तत्व होना अनिवार्य है।
यह पूरा मामला पालमपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय से जुड़ा है। विश्वविद्यालय में तैनात एक वरिष्ठ साइंटिफिक ऑफिसर ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उन्हें एक अज्ञात स्रोत से अत्यंत अपमानजनक और अश्लील ईमेल प्राप्त हुआ है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इस ईमेल में न केवल उनके विरुद्ध, बल्कि उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ भी बेहद निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग किया गया था, जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा पहुंची।
पुलिस ने शुरुआत में इस शिकायत के आधार पर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 66-ए के तहत मामला दर्ज किया था। तकनीकी जांच और साइबर सेल की मदद से पुलिस को पता चला कि वह विवादित ईमेल डॉ. तिलक राज शर्मा के नाम पर पंजीकृत बीएसएनएल के आईपी एड्रेस से भेजा गया था। इसी आधार पर उन्हें आरोपी बनाया गया था।
हालांकि, सुनवाई के दौरान डॉ. तिलक राज शर्मा की ओर से यह दलील दी गई कि आईटी एक्ट की धारा 66-ए, जिसके तहत उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया है, उसे सुप्रीम कोर्ट बहुत पहले ही असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर चुका है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जिस कानून का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है, उसके तहत किसी पर मुकदमा चलाना कानूनी रूप से अवैध है।
हाई कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि केवल ईमेल में गालियां देना भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं के दायरे में भी नहीं आता जो आपराधिक धमकी या सार्वजनिक शांति भंग करने से संबंधित हैं। अदालत ने कहा कि ईमेल दो व्यक्तियों के बीच का निजी संवाद है, जिससे समाज में अराजकता फैलने की संभावना न के बराबर होती है। इन्ही तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने डॉ. तिलक राज शर्मा के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को पूरी तरह निरस्त कर दिया। यह फैसला व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और आपराधिक दायित्व के बीच की बारीक कानूनी रेखा को स्पष्ट करता है।
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