चंडीगढ़। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने जल प्रबंधन और अंतर्राज्यीय जल वितरण के मामले में एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक मुद्दा उठाकर पड़ोसी राज्य राजस्थान के साथ एक नई बहस छेड़ दी है। बुधवार को सिंचाई क्षेत्र के आंकड़े प्रस्तुत करने के लिए आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान भगवंत मान ने दावा किया कि पंजाब द्वारा दशकों से राजस्थान को दिए जा रहे पानी का बकाया अब एक बहुत बड़ी राशि में तब्दील हो चुका है। मुख्यमंत्री ने पुराने सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक समझौतों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1960 से लेकर 2026 तक का हिसाब लगाया जाए, तो राजस्थान पर पंजाब का लगभग 1.44 लाख करोड़ रुपये का बकाया निकलता है। मुख्यमंत्री के इस बयान ने देश की सियासत और जल कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है।
ऐतिहासिक समझौते और भुगतान का विवाद
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस विवाद की जड़ें इतिहास में तलाशते हुए बताया कि पानी की आपूर्ति का यह सिलसिला आज का नहीं, बल्कि सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। उन्होंने जानकारी दी कि वर्ष 1920 में बीकानेर रियासत और बहावलपुर के बीच एक औपचारिक समझौता हुआ था, जिसके तहत पंजाब की नदियों का पानी उन इलाकों तक पहुँचाया गया जो अब राजस्थान का हिस्सा हैं। उस समय के समझौते में यह स्पष्ट प्रावधान था कि राजस्थान को मिलने वाले पानी के बदले प्रति एकड़ के हिसाब से एक निश्चित शुल्क का भुगतान करना होगा।
भगवंत मान के अनुसार, इस समझौते का पालन वर्ष 1960 तक पूरी निष्ठा के साथ किया गया और राजस्थान नियमित रूप से पानी का शुल्क चुकाता रहा। हालांकि, 1960 के बाद जब देश में नई प्रशासनिक और राजनैतिक व्यवस्थाएं लागू हुईं, तो यह भुगतान प्रक्रिया रहस्यमयी तरीके से बंद हो गई। हैरानी की बात यह है कि पिछले छह दशकों में न तो राजस्थान सरकार ने अपनी ओर से कोई भुगतान किया और न ही पंजाब की पिछली सरकारों ने कभी इस हक की मांग उठाई। मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में कहा कि वर्तमान सरकार ने जब पुराने रिकॉर्ड खंगाले और महंगाई व समय के अनुसार आकलन किया, तो यह राशि 1.44 लाख करोड़ रुपये के विशाल आंकड़े तक पहुँच गई है।
भुगतान या समझौते की समाप्ति की चेतावनी
भगवंत मान ने राजस्थान सरकार के समक्ष स्पष्ट विकल्प रखे हैं। उन्होंने कहा कि यदि राजस्थान आज भी 1920 के उसी पुराने समझौते के आधार पर पंजाब की नदियों से पानी ले रहा है, तो उसे उस समझौते की दूसरी शर्त यानी ‘भुगतान’ को भी उसी आधार पर पूरा करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि जब वर्तमान में राजस्थान फीडर के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 18 हजार क्यूसेक पानी पड़ोसी राज्य को जा रहा है, तो पंजाब को इसके बदले कोई आर्थिक लाभ क्यों नहीं मिल रहा? उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि बकाया राशि का भुगतान नहीं होता है, तो या तो इस पुराने समझौते को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाना चाहिए या फिर पानी की आपूर्ति की मात्रा पर पंजाब सरकार को पुनर्विचार करना होगा। मुख्यमंत्री ने संकेत दिए कि वे इस मुद्दे को अब केंद्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी कर रहे हैं।
पंजाब में सिंचाई के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भगवंत मान ने केवल विवादों पर ही नहीं, बल्कि अपनी सरकार द्वारा सिंचाई विभाग में किए गए सुधारों पर भी विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने दावा किया कि पिछले चार वर्षों में पंजाब के सिंचाई ढांचे में जो बदलाव आए हैं, वे पिछले कई दशकों में नहीं देखे गए। मुख्यमंत्री ने आंकड़ों के जरिए बताया कि जब 2022 में उनकी सरकार सत्ता में आई थी, तब राज्य में नहरी पानी का उपयोग केवल 26.5 प्रतिशत तक सीमित था। सरकार के निरंतर प्रयासों और भारी निवेश के कारण अब यह उपयोग बढ़कर लगभग 58 लाख एकड़ क्षेत्र तक पहुँच गया है, जो कि 78 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि को दर्शाता है।
इस प्रगति को संभव बनाने के लिए भगवंत मान सरकार ने सिंचाई विभाग के बजट में तीन गुना बढ़ोतरी की और चार वर्षों के भीतर लगभग 6700 करोड़ रुपये खर्च किए। बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए 13,938 किलोमीटर लंबे नए ‘खाल’ (वाटर कोर्स) का निर्माण किया गया और 18,000 किलोमीटर से अधिक पुराने और जर्जर सिंचाई ढांचों को फिर से बहाल किया गया।
कागजों से निकलकर जमीन पर उतरीं नहरें
मुख्यमंत्री ने एक और चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि राज्य में कई ऐसी नहरें और सिंचाई प्रणालियां थीं जो सरकारी रिकॉर्ड और कागजों में तो फल-फूल रही थीं, लेकिन जमीन पर उनका कोई अस्तित्व नहीं बचा था। प्रशासन ने ऐसी ‘गुम’ हो चुकी नहरों को खोजने का अभियान चलाया। तरनतारन की सरहाली नहर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब वहां खुदाई की गई तो मिट्टी के नीचे दबे हुए पुराने नहरी ढांचे मिले। सरकार ने कड़ी मेहनत से इस 22 किलोमीटर लंबी नहर को पुनर्जीवित किया। इसके अलावा, राज्य के 1454 ऐसे गांवों तक पहली बार नहरी पानी पहुँचाया गया है, जो आजादी के बाद से अब तक केवल बारिश या भूजल पर निर्भर थे। कंडी क्षेत्र के किसानों के लिए भी 1500 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन बिछाकर 24 हजार एकड़ भूमि को सिंचाई की सुविधा दी गई है।
जलस्तर में सुधार और शाहपुर कंडी परियोजना
नहरी पानी की उपलब्धता बढ़ने का सीधा और सकारात्मक प्रभाव पंजाब के गिरते भूजल स्तर पर पड़ा है। भगवंत मान ने बताया कि गुरदासपुर जैसे जिलों में अब किसानों को टयूबवेल की जरूरत कम पड़ रही है, जिससे भूजल निकालने की दर (एक्सट्रैक्शन रेट) आधे से भी कम रह गई है। सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, 57 प्रतिशत से अधिक कुओं में जलस्तर 0 से 4 मीटर तक ऊपर आया है। मुख्यमंत्री ने 25 साल से लटकी हुई ‘शाहपुर कंडी डैम’ परियोजना को पूरा करना अपनी बड़ी उपलब्धि बताया। 3394.49 करोड़ रुपये की इस परियोजना से न केवल सिंचाई क्षमता बढ़ेगी, बल्कि बिजली उत्पादन और पर्यटन को भी नई दिशा मिलेगी। बांध के आसपास 26 नए पर्यटन स्थल विकसित किए जा रहे हैं।
अंत में मुख्यमंत्री ने आपदा प्रबंधन पर जानकारी देते हुए बताया कि ‘स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड’ के तहत 470 करोड़ रुपये खर्च कर 3700 किलोमीटर ड्रेनों की सफाई सुनिश्चित की गई है, ताकि भविष्य में बाढ़ जैसी स्थितियों से बचा जा सके। भगवंत मान के इस आक्रामक और आंकड़ों से भरे रुख ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में राजस्थान और पंजाब के बीच पानी का यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक और कानूनी टकराव का रूप ले सकता है।