Himachal: हिमाचल प्रदेश में विधायक निधि की लंबित किस्तों को लेकर बढ़ी सरगर्मी मुख्यमंत्री सुक्खू के पास पहुंची फाइल

शिमला। हिमाचल प्रदेश में विकास कार्यों की धमनियां मानी जाने वाली ‘विधायक क्षेत्र विकास निधि’ को लेकर इन दिनों प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में काफी हलचल देखी जा रही है। वर्तमान वित्तीय वर्ष अपने अंतिम चरणों की ओर बढ़ रहा है, लेकिन अभी तक प्रदेश के विधायकों को उनकी विकास निधि की चार में से केवल दो किस्तें ही प्राप्त हुई हैं। शेष तीसरी और चौथी किस्त अभी भी सरकार के स्तर पर लंबित हैं, जिसके कारण विधायकों के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए वादों और घोषणाओं को पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस बीच, एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में तीसरी किस्त जारी करने से संबंधित आधिकारिक फाइल मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के पास पहुंच गई है, जिससे अब सभी की निगाहें उनके निर्णय पर टिकी हैं।

हिमाचल प्रदेश में प्रत्येक विधायक को अपने क्षेत्र में छोटे-बड़े विकास कार्यों को संपन्न कराने के लिए प्रतिवर्ष 2.20 करोड़ रुपये की विकास निधि आवंटित की जाती है। इस राशि का वितरण चार समान किस्तों में किया जाता है। अब तक सरकार ने 55-55 लाख रुपये की दो किस्तें जारी कर दी हैं, लेकिन शेष 1.10 करोड़ रुपये की राशि अभी तक जारी नहीं हो पाई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पूर्व में कई मंचों से यह स्पष्ट किया है कि प्रदेश की वर्तमान वित्तीय स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है और सरकार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने के लिए फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है। उन्होंने आश्वासन दिया था कि जैसे ही राज्य की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार होगा, वैसे ही लंबित किस्तों को प्राथमिकता के आधार पर जारी कर दिया जाएगा।

विधायक प्राथमिकता बैठक और विपक्ष का दबाव
विधायक निधि का मुद्दा केवल विपक्षी दल भाजपा तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के कई विधायक भी दबी जुबान में इसके लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं। हाल ही में आयोजित हुई ‘विधायक प्राथमिकता बैठक’ के दौरान भी यह मामला प्रमुखता से उठा था। विधायकों का तर्क है कि उनके निर्वाचन क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण कार्य आधे-अधूरे पड़े हैं।

विशेष रूप से मानसून और शीतकालीन सत्रों के दौरान विपक्षी भाजपा विधायकों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को सदन में जमकर घेरा था। विपक्ष का कहना है कि विधायकों ने अपने क्षेत्रों की ग्राम पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को राशि जारी करने के लिए सिफारिशी पत्र महीनों पहले दे दिए थे। लोग अब उन विकास कार्यों के शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन राशि के अभाव में धरातल पर काम शुरू नहीं हो पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग बार-बार विधायकों के पास पहुंचकर यह शिकायत कर रहे हैं कि उनकी घोषणाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह गई हैं, जिससे विधायकों की छवि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

वित्तीय संकट और प्राकृतिक आपदा की मार
हिमाचल प्रदेश पिछले तीन वर्षों से लगातार प्राकृतिक आपदाओं और विनाशकारी बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है। इस कारण राज्य के खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा है। सरकार का एक बड़ा हिस्सा राहत और पुनर्निर्माण कार्यों में खर्च हो रहा है। यही मुख्य कारण है कि विकास निधि जैसी मदों में कटौती या देरी करनी पड़ रही है। मुख्यमंत्री सुक्खू बार-बार केंद्र सरकार से भी अतिरिक्त सहायता की मांग कर चुके हैं ताकि राज्य की विकास की गति धीमी न पड़े।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, अब जब तीसरी किस्त की फाइल मुख्यमंत्री के मेज पर पहुंच चुकी है, तो यह उम्मीद जताई जा रही है कि कम से कम एक और किस्त जल्द ही जारी की जा सकती है। इससे उन विकास कार्यों को फिर से गति मिल सकेगी जो धन की कमी के कारण बीच में ही रुक गए थे। सरकार भी जानती है कि ग्रामीण विकास सीधे तौर पर जनता से जुड़ा मुद्दा है और इसकी अनदेखी करना आगामी समय में राजनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है।

फिलहाल, 55 लाख रुपये की दो किस्तों के सहारे ही विधायक अपने क्षेत्रों के कार्यों को मैनेज करने की कोशिश कर रहे हैं। विधायकों को अब मुख्यमंत्री की हरी झंडी का इंतजार है, ताकि वे अपने क्षेत्रों में लंबित पड़ी फाइलों और जनता की मांगों का समाधान कर सकें। आने वाले कुछ दिनों में यह साफ हो जाएगा कि राज्य की तिजोरी से विकास निधि की अगली खेप कब बाहर निकलती है। सरकार के लिए यह आर्थिक मजबूती और जन-आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी परीक्षा है।

 

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