Himachal: हिमाचल में पंचायतों का पुनर्गठन पूरा 3773 पंचायतों में बजने वाला है चुनावी बिगुल

शिमला। हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायती राज चुनावों के लिए लोकतांत्रिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने प्रदेश में पंचायतों के पुनर्गठन की लंबी और जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न करते हुए अंतिम अधिसूचना जारी कर दी है। इस नए सीमांकन के बाद अब हिमाचल प्रदेश में कुल पंचायतों की संख्या बढ़कर 3773 हो गई है। इस ऐतिहासिक पुनर्गठन के साथ ही प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं, क्योंकि इस बार के चुनावों में कुल 3773 प्रधानों और इतने ही उपप्रधानों का चयन राज्य के मतदाताओं द्वारा किया जाएगा। पंचायती राज विभाग की इस अधिसूचना ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार अब पूरी तरह से चुनावी मोड में आ चुकी है और प्रशासनिक स्तर पर सभी आवश्यक तैयारियां मुकम्मल कर ली गई हैं।

न्यायिक समयसीमा और प्रशासनिक सक्रियता
प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर कानूनी बाध्यताएं भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि हिमाचल प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली के चुनाव 31 मई से पहले संपन्न होने अनिवार्य हैं। इस त्रिस्तरीय ढांचे के तहत ग्राम पंचायतों के अतिरिक्त 91 पंचायत समितियों और 12 जिला परिषद प्रतिनिधियों के चुनाव भी आयोजित किए जाएंगे।

न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए पंचायती राज विभाग ने युद्ध स्तर पर कार्य शुरू कर दिया है। विभाग ने राज्य के सभी जिलों के उपायुक्तों को कड़े निर्देश जारी किए हैं कि 25 मार्च से पूर्व परिसीमन (डीलिमिटेशन) की समस्त प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाए। परिसीमन का कार्य पूर्ण होते ही, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार 30 मार्च से पहले आरक्षण रोस्टर जारी कर दिया जाएगा। आरक्षण रोस्टर जारी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि कौन सी सीटें महिलाओं, अनुसूचित जाति और अन्य वर्गों के लिए आरक्षित होंगी, जो चुनावी समीकरणों को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

पुनर्गठन का गणित और नई पंचायतों का उदय
हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण मानचित्र में यह बदलाव काफी व्यापक है। यदि पिछले पंचायत चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें, तो उस समय प्रदेश में 3615 ग्राम पंचायतें मौजूद थीं। पिछले कुछ वर्षों में जनसंख्या वृद्धि और प्रशासनिक आवश्यकताओं को देखते हुए नई पंचायतों की मांग लगातार उठ रही थी। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने कुल 200 नई पंचायतों के गठन का निर्णय लिया।

हालांकि, पंचायतों की संख्या में यह वृद्धि सीधे तौर पर 200 नहीं रही। इसकी मुख्य वजह यह है कि इसी समयावधि के दौरान प्रदेश में कई नए नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों का भी गठन किया गया। शहरी निकायों के विस्तार के कारण 46 पुरानी ग्राम पंचायतों का अस्तित्व समाप्त हो गया और उनका पूर्ण रूप से शहरी क्षेत्रों में विलय कर दिया गया। इस प्रकार, 200 नई पंचायतों के जुड़ने और 46 के विलय के बाद अब प्रदेश में कुल पंचायतों का आंकड़ा 3773 पर पहुंच गया है। विभाग ने इस पुनर्गठन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 64 नई पंचायतों को अधिसूचित किया है, जो इस पूरी प्रक्रिया की आखिरी कड़ी थी।

पांच चरणों में संपन्न हुई गठन की प्रक्रिया
राज्य सरकार ने नई पंचायतों के गठन के कार्य को बेहद व्यवस्थित तरीके से पांच अलग-अलग चरणों में पूरा किया है।

  • प्रथम चरण: इस चरण में प्रशासनिक स्तर पर शुरुआती 4 नई पंचायतों के गठन को मंजूरी दी गई।

  • द्वितीय चरण: दूसरे चरण में भी 4 नई पंचायतों को अधिसूचित किया गया।

  • तृतीय चरण: जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढ़ी, तीसरे चरण में 39 नई पंचायतों का निर्माण किया गया।

  • चतुर्थ चरण: यह चरण सबसे बड़ा साबित हुआ, जिसमें रिकॉर्ड 89 नई पंचायतों को मंजूरी दी गई।

  • पंचम चरण: अंतिम चरण में सरकार ने 64 नई पंचायतों को अधिसूचित कर इस महत्वाकांक्षी पुनर्गठन कार्य को पूर्णता प्रदान की।

ग्रामीण विकास और सुशासन की दिशा में कदम
पंचायतों के इस व्यापक पुनर्गठन के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य सुशासन और प्रशासनिक सुगमता है। छोटी प्रशासनिक इकाइयों के गठन से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी। जनसंख्या के आधार पर पंचायतों के बंटवारे से अब सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना आसान होगा। लोगों को अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए अब लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि नई पंचायतों के गठन से पंचायत कार्यालय उनके और अधिक नजदीक आ गए हैं।

त्रिस्तरीय प्रणाली के तहत होने वाले इन चुनावों में जिला परिषद और पंचायत समितियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहेगी। विभाग अब पूरी तरह से चुनावी कैलेंडर को अमलीजामा पहनाने में जुट गया है। 25 मार्च तक परिसीमन और 30 मार्च तक आरक्षण रोस्टर की समयसीमा यह सुनिश्चित करेगी कि अप्रैल और मई के महीनों में चुनावी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। हिमाचल प्रदेश की ग्रामीण जनता अब अपने नए प्रतिनिधियों को चुनने के लिए तैयार है, जो आने वाले पांच वर्षों तक विकास की बागडोर संभालेंगे।

 

Pls read:Himachal: हिमाचल प्रदेश में विधायक निधि की लंबित किस्तों को लेकर बढ़ी सरगर्मी मुख्यमंत्री सुक्खू के पास पहुंची फाइल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *