नई दिल्ली। पश्चिम एशिया के देशों में जारी भीषण सैन्य संघर्ष ने वर्तमान में न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाला है, बल्कि संपूर्ण वैश्विक ऊर्जा बाजार की नींव को भी झकझोर कर रख दिया है। इस युद्ध के कारण तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई है, जिसका सीधा असर दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों पर पड़ रहा है। आपूर्ति बाधित होने के कारण कई प्रमुख तेल उत्पादक देशों को अपनी रिफाइनरियों में या तो उत्पादन पूरी तरह रोकना पड़ा है या फिर उसमें भारी कटौती करनी पड़ी है। इस संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) बन गया है, जो दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइन मानी जाती है। वर्तमान स्थितियों को देखते हुए इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी तेल निर्यातक कंपनियों में शुमार सऊदी अरामको ने इस गंभीर स्थिति पर एक बड़ी चेतावनी जारी की है। कंपनी का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को जहाजों के आवागमन के लिए जल्द ही सुरक्षित नहीं बनाया गया और यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा, तो वैश्विक तेल बाजार को भविष्य में बेहद विनाशकारी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अरामको के अनुसार, इस मार्ग के बंद होने का मतलब दुनिया की ऊर्जा धमनियों का रुक जाना है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है।
प्रमुख ऊर्जा परियोजनाओं और उत्पादन पर पड़ने वाला असर
इस युद्ध की आग ने क्षेत्र की कई बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ा है। सऊदी अरब जैसे बड़े तेल उत्पादक देश को अपनी प्रसिद्ध रास तनुरा रिफाइनरी का संचालन पूरी तरह से रोकना पड़ा है और वहां उत्पादन में भारी कटौती की गई है। इसी प्रकार, संयुक्त अरब अमीरात में भी स्थिति सामान्य नहीं है। वहां की विशाल रुवैस रिफाइनरी पर हुए भीषण ड्रोन हमले के बाद अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी को सुरक्षा कारणों से इसे बंद करना पड़ा है।
पड़ोसी देशों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही बनी हुई है। कुवैत ने अपने तेल उत्पादन में भारी कमी करते हुए आधिकारिक तौर पर ‘फोर्स मेज्योर’ की घोषणा कर दी है, जिसका अर्थ है कि अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण वह अपने व्यावसायिक अनुबंधों को पूरा करने में असमर्थ है। वहीं, इराक के दक्षिणी तेल क्षेत्रों से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। इराक का तेल उत्पादन, जो पहले 43 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर था, वह अब घटकर महज 13 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है। आपूर्ति में आई इस भारी गिरावट ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को अस्थिर कर दिया है। कई अन्य अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों ने भी इसी तरह ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित कर अपनी गतिविधियों को सीमित कर लिया है।
समुद्री परिवहन और जहाजों के लिए बढ़ता जोखिम
होर्मुज जलडमरूमध्य के पास सुरक्षा की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है। इस संकरे समुद्री रास्ते के आसपास पिछले कुछ समय में कई जहाजों और तेल टैंकरों पर घातक हमले हुए हैं। इन हमलों के बढ़ते खतरे के कारण अधिकांश बड़ी शिपिंग कंपनियों और टैंकर संचालकों ने इस मार्ग से अपने जहाजों को गुजारना बंद कर दिया है। समुद्री परिवहन पर मंडराते इस खतरे का असर बीमा क्षेत्र पर भी पड़ा है। कई वैश्विक समुद्री बीमा कंपनियों ने इस युद्धग्रस्त क्षेत्र के लिए प्रदान किए जाने वाले ‘युद्ध जोखिम बीमा’ को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। बीमा कवर न होने की वजह से जहाज मालिक जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं।
हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट के बीच एक बयान जारी कर कहा है कि यदि आवश्यकता हुई तो अमेरिकी नौसेना व्यापारिक टैंकरों को सुरक्षा (एस्कॉर्ट) प्रदान कर सकती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगातार हो रहे हमलों और अनिश्चितता के माहौल के कारण अभी तक अमेरिकी नौसेना ने ऐसे किसी भी अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है। नौसेना का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सुरक्षा की गारंटी देना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
महंगाई और जीवन-यापन की लागत बढ़ने की आशंका
ऊर्जा संकट के साथ-साथ अब आम जनता पर महंगाई की मार पड़ने का खतरा भी बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र ने इस विषय पर एक चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य इसी तरह बंद रहता है, तो दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमतों और जीवन-यापन की लागत में भारी वृद्धि हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, समुद्र के रास्ते होने वाले कुल वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। केवल तेल ही नहीं, बल्कि कृषि के लिए महत्वपूर्ण उर्वरक और ऊर्जा का मुख्य स्रोत एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) भी इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भेजे जाते हैं।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा की कमी और परिवहन लागत में होने वाली वृद्धि, जैसे माल ढुलाई भाड़ा, जहाजों का ईंधन और बढ़ी हुई बीमा दरें, अंततः उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों को बढ़ा देंगी। जब परिवहन महंगा होगा, तो हर छोटी-बड़ी चीज की लागत बढ़ जाएगी, जिससे दुनिया भर में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है। यदि यह गतिरोध जल्द दूर नहीं हुआ, तो इसका सबसे बुरा प्रभाव गरीब और विकासशील देशों के नागरिकों पर पड़ेगा, जिनकी जीवन-यापन की लागत पहले ही बढ़ी हुई है। संक्षेप में, पश्चिम एशिया का यह युद्ध अब केवल दो क्षेत्रों के बीच की लड़ाई न रहकर एक वैश्विक आर्थिक संकट का रूप लेता जा रहा है।
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