नई दिल्ली। बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त का कमजोर होना आमतौर पर एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। अक्सर देखा जाता है कि बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखते ही लोग चीजें भूलने लगते हैं और उनकी मानसिक एकाग्रता घटने लगती है। लेकिन विज्ञान की दुनिया में कुछ ऐसे विलक्षण लोग भी हैं, जो 80 साल की उम्र पार करने के बाद भी 50 साल के व्यक्ति जैसी अद्भुत मानसिक तेजी और याददाश्त बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे लोगों को ‘सुपर-एजर्स’ का नाम दिया है। हाल ही में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक शोध ने इंसानी दिमाग की इस जादुई क्षमता का खुलासा किया है, जो बुढ़ापे में भी खुद को जवां रखने की ताकत रखती है।
इस महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, इन ‘सुपर-एजर्स’ के मस्तिष्क में नई कोशिकाओं के निर्माण की एक असाधारण क्षमता होती है। वैज्ञानिक भाषा में नई मस्तिष्क कोशिकाएं यानी न्यूरॉन्स बनने की इस प्रक्रिया को ‘न्यूरोजेनेसिस’ कहा जाता है। रिसर्च में यह बात सामने आई है कि यही वह मुख्य कारण है जो ढलती उम्र में भी उनके दिमाग को थकने या सुस्त होने से रोकता है। जब शोधकर्ताओं ने इन विशेष लोगों के मस्तिष्क का गहराई से विश्लेषण किया, तो परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे।
अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक, एक सामान्य बुजुर्ग की तुलना में इन सुपर-एजर्स के दिमाग में दोगुने से भी अधिक नए न्यूरॉन्स मौजूद थे। यदि इनकी तुलना अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों से की जाए, तो सुपर-एजर्स के पास ढाई गुना ज्यादा नई कोशिकाएं पाई गईं। सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह रहा कि 20 से 40 वर्ष के स्वस्थ युवाओं की तुलना में भी इन सुपर-एजर्स के मस्तिष्क में कोशिकाएं कहीं अधिक सक्रिय और बेहतर स्थिति में थीं।
यह पूरी रिसर्च मानव मस्तिष्क के मुख्य याददाश्त केंद्र ‘हिप्पोकैम्पस’ पर केंद्रित थी। इस शोध से जुड़ी विशेषज्ञ तामार गेफेन का मानना है कि यह अध्ययन इस बात का एक ठोस जैविक प्रमाण पेश करता है कि बुढ़ापे का अर्थ अनिवार्य रूप से मानसिक गिरावट नहीं है। उनके अनुसार, हमारा मस्तिष्क उम्र के किसी भी पड़ाव पर लचीला और सक्रिय बना रह सकता है, बशर्ते उसमें न्यूरोजेनेसिस की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहे।
यह खोज न केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि भविष्य के चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ी उम्मीद भी बनकर उभरी है। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि सुपर-एजर्स के दिमाग की इस विशेष कार्यप्रणाली को गहराई से समझकर आने वाले समय में अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी खतरनाक दिमागी बीमारियों के उपचार के नए और प्रभावी रास्ते तलाशे जा सकेंगे। यह शोध हमें सिखाता है कि मानसिक स्वास्थ्य को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखना पूरी तरह संभव है।