मुंबई। महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार ने राज्य की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम समुदाय को मिलने वाले पांच प्रतिशत आरक्षण को आधिकारिक रूप से रद कर दिया है। मंगलवार को राज्य के सामाजिक न्याय विभाग ने इस संबंध में एक नया सरकारी प्रस्ताव (GR) जारी किया, जिसके तहत पिछली सरकार द्वारा दिए गए आरक्षण से जुड़े सभी पुराने आदेशों और अध्यादेशों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है। सरकार के इस कदम के बाद अब राज्य में मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से किसी कोटे का प्रावधान नहीं रहेगा।
इस विवाद की जड़ साल 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार द्वारा लिए गए एक निर्णय में है। उस समय सरकार ने मराठों को 16 प्रतिशत और मुस्लिमों को पांच प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) जारी किया था। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, इस अध्यादेश को 6 सप्ताह के भीतर विधानसभा से पारित होना अनिवार्य था, लेकिन कांग्रेस सरकार ऐसा करने में विफल रही। इसी तकनीकी खामी के कारण यह आदेश पिछले एक दशक से कानूनी रूप से अमान्य स्थिति में था, जिसे अब वर्तमान सरकार ने औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है।
नए सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, ‘विशेष पिछड़ा वर्ग (A)’ कैटेगरी के तहत आने वाले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समूहों को मिलने वाला 5 प्रतिशत का लाभ अब खत्म हो गया है। सरकारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2014 से पहले के उन सभी परिपत्रों (सर्कुलर) और निर्णयों को रद कर दिया गया है जो इस आरक्षण को आधार प्रदान करते थे। इसके साथ ही, अब विशेष पिछड़ा वर्ग में मुस्लिमों को जाति प्रमाण पत्र और ‘नॉन-क्रीमी लेयर’ सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया भी पूरी तरह बंद कर दी गई है।
मुस्लिम आरक्षण का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस कोटे का ऐलान किया था। हालांकि, मामला जल्द ही बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँच गया। अक्टूबर 2014 में अदालत ने एक अंतरिम आदेश देते हुए शिक्षा में तो पांच प्रतिशत आरक्षण जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन सरकारी नौकरियों में इस पर रोक लगा दी थी। अदालत का तर्क था कि नौकरियों में कोटे के लिए सरकार ने पर्याप्त ठोस डेटा पेश नहीं किया है। 2015 से 2018 के बीच भी यह मामला अदालतों में उलझा रहा, लेकिन इसके लिए कोई नया ठोस कानून नहीं बनाया गया। अंततः फरवरी 2026 में सरकार ने इस लंबी चली आ रही अनिश्चितता को खत्म करते हुए इसे पूरी तरह रद करने का निर्णय लिया है। विपक्ष ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है, जबकि सत्ता पक्ष इसे केवल पुरानी विसंगतियों को दूर करने का एक प्रशासनिक कदम बता रहा है।
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