SC: शादी का वादा टूटना दुष्कर्म नहीं आपसी सहमति के रिश्तों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला – The Hill News

SC: शादी का वादा टूटना दुष्कर्म नहीं आपसी सहमति के रिश्तों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों और शादी के वादे के टूटने से जुड़े मामलों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म करने के आरोप में दर्ज एक प्राथमिकी (एफआइआर) को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि हर वह रिश्ता जो विवाह की मंजिल तक नहीं पहुँच पाता, उसे ‘झूठा वादा’ या आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला स्पष्ट रूप से दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने उन संबंधों का है, जिनमें बाद में कड़वाहट आ गई। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि निजी रिश्तों के विवादों में कानूनी मशीनरी का उपयोग करना और उन्हें आपराधिक रंग देना सही नहीं है।

यह मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का है, जहाँ फरवरी 2025 में एक महिला ने एक व्यक्ति के खिलाफ शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के गंभीर आरोपों में मुकदमा दर्ज कराया था। आरोपित ने इस एफआइआर को रद करने के लिए पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन पिछले वर्ष मार्च में हाईकोर्ट ने कार्यवाही को रद करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद यह मामला अपील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी पर दुष्कर्म का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता कि अंततः शादी का वादा पूरा नहीं हो सका। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पक्षों को संयम बरतना चाहिए और अपने निजी मतभेदों के लिए राज्य की कानूनी मशीनरी को अनावश्यक रूप से परेशान करने से बचना चाहिए।

इस मामले के तथ्यों ने कोर्ट को इस निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद की कि यह मामला कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का एक विशिष्ट उदाहरण है। मामले में शिकायतकर्ता और आरोपित, दोनों ही पेशेवर वकील हैं। शिकायतकर्ता एक 33 वर्षीय महिला है जो न केवल विवाहित है, बल्कि एक बच्चे की मां भी है। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जब यह कथित घटना हुई और संबंध बने, तब महिला का अपने पति से तलाक का मामला अदालत में लंबित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए कहा कि जब महिला पहले से ही विवाहित थी, तो वह कानूनी रूप से किसी अन्य व्यक्ति के साथ शादी करने के लिए पात्र ही नहीं थी। भारतीय कानून एक जीवित जीवनसाथी के रहते हुए दूसरे विवाह (द्विविवाह) की अनुमति नहीं देता है।

पीठ ने विशेष रूप से शिकायतकर्ता के पेशे का उल्लेख करते हुए कहा कि एक वकील होने के नाते उसे इस कानूनी स्थिति का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि यह मानना व्यावहारिक रूप से असंभव है कि एक कानूनी विशेषज्ञ होने के बावजूद महिला को इस बात का पता नहीं था कि वह अभी दूसरी शादी नहीं कर सकती। ऐसे में यह कहना कि उसे शादी के बहाने यौन संबंध बनाने के लिए ‘बरगलाया’ गया या उसके साथ ‘धोखा’ हुआ, गले नहीं उतरता। कोर्ट ने माना कि यह पूरी तरह से एक सचेत निर्णय था और महिला कोई ऐसी भोली-भाली किशोरी नहीं थी जिसे निर्णय लेने की समझ न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उन पुराने न्यायिक निर्णयों का भी विस्तार से उल्लेख किया, जिनमें टूटे हुए प्रेम संबंधों को ‘आपराधिक मोड़’ देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की गई थी। जजों ने कहा कि अदालतों की यह जिम्मेदारी है कि वे उन वास्तविक मामलों, जहाँ वास्तव में धोखे से सहमति प्राप्त की गई हो, और उन मामलों के बीच स्पष्ट अंतर करें जो केवल भविष्य में मन बदलने या आपसी झगड़े के कारण दर्ज कराए जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि सहमति से बने संबंधों में जब दरार आती है, तो उसे अक्सर बदला लेने की भावना से दुष्कर्म का मामला बनाने का प्रयास किया जाता है, जो कि न्याय प्रणाली के लिए चिंताजनक है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि देश की कानूनी मशीनरी और पुलिस व्यवस्था पहले से ही मुकदमों के बोझ तले दबी हुई है। ऐसे में निजी संबंधों की कड़वाहट को अपराध का जामा पहनाकर कोर्ट का समय बर्बाद करना अनुचित है। पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था और केवल इसलिए आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं कराना चाहिए था क्योंकि उसका व्यक्तिगत रिश्ता उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति का मतलब केवल उस समय की इच्छा से है और यदि बाद में परिस्थितियां बदलती हैं, तो उसे पीछे जाकर अपराध नहीं घोषित किया जा सकता।

अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपित के खिलाफ लगाए गए दुष्कर्म के आरोप पूरी तरह से निराधार और कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं। कोर्ट ने बिलासपुर में फरवरी 2025 में दर्ज की गई एफआइआर और उसके बाद की जा रही सभी कानूनी कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से रद कर दिया। इस फैसले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि वयस्क व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल शादी न होने की स्थिति में दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब शिकायतकर्ता शिक्षित हो और कानूनी परिणामों को समझने में सक्षम हो। यह फैसला उन मामलों के लिए एक नजीर साबित होगा जहाँ आपसी सहमति के रिश्तों के टूटने के बाद आपराधिक मुकदमेबाजी का सहारा लिया जाता है।

 

Pls read:SC: यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक और पुराने विनियमों की बहाली

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *