शिमला। हिमाचल प्रदेश में पिछले लंबे समय से चल रही पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की अस्थाई व्यवस्था अब जल्द ही समाप्त हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तेलंगाना के एक मामले में दिए गए हालिया आदेशों ने हिमाचल प्रदेश में भी नियमित डीजीपी की नियुक्ति की उम्मीदों को पंख लगा दिए हैं। न्यायालय ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को यह अधिकार प्रदान किया है कि वह राज्यों में नियमित डीजीपी के चयन के लिए समयबद्ध तरीके से राज्य सरकारों को पत्र लिख सके और प्रक्रिया को तेज करने के लिए निर्देशित कर सके। इस आदेश के बाद अब राज्य सरकार को यूपीएससी के माध्यम से नियमित पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए पैनल भेजने की प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से पूरा करना होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जाय माल्या बागची की खंडपीठ ने वीरवार को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी। अदालत का मानना है कि राज्यों में लंबे समय तक कार्यकारी डीजीपी का होना प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं है। हिमाचल प्रदेश की बात करें तो यहाँ 31 मई 2025 को तत्कालीन डीजीपी अतुल वर्मा की सेवानिवृत्ति के बाद से पद खाली पड़ा है। तब से लेकर अब तक अशोक तिवारी बतौर कार्यकारी पुलिस महानिदेशक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जनवरी माह में अशोक तिवारी का इस पद पर आठ माह का कार्यकाल पूरा हो चुका है, लेकिन राज्य में अभी तक किसी नियमित अधिकारी की तैनाती नहीं हो पाई है।
हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में वरिष्ठता सूची को देखें तो 1990 बैच के आइपीएस अधिकारी श्याम भगत नेगी सबसे वरिष्ठ हैं। वे वर्तमान में अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग का जिम्मा संभाल रहे हैं। हालांकि, उनकी सेवानिवृत्ति इसी वर्ष 31 मार्च को होने वाली है। नियमानुसार, डीजीपी पद के लिए चुने जाने वाले अधिकारी के पास सेवा का एक न्यूनतम कार्यकाल बचा होना चाहिए, इसलिए श्याम भगत नेगी इस पद की दौड़ से बाहर माने जा रहे हैं। उनके बाद वरिष्ठता सूची में 1993 बैच के आइपीएस अधिकारी अशोक तिवारी का नाम आता है, जो वर्तमान में कार्यकारी डीजीपी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
नियमित डीजीपी की नियुक्ति के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। राज्य सरकार को वरिष्ठता और पात्रता के आधार पर तीन सबसे वरिष्ठ आइपीएस अधिकारियों का एक पैनल तैयार कर यूपीएससी को भेजना होता है। यूपीएससी इन नामों की समीक्षा करता है और सेवा रिकॉर्ड व अन्य मानकों के आधार पर नियमित नियुक्ति के लिए संस्तुति प्रदान करता है। अक्सर देखा गया है कि राज्य सरकारें अपनी पसंद के अधिकारी को पुलिस प्रमुख बनाने के लिए इस प्रक्रिया में देरी करती हैं और कार्यकारी डीजीपी की नियुक्ति कर देती हैं। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला इसी ‘एडहॉक’ संस्कृति पर लगाम लगाने के लिए आया है।
हिमाचल के आइपीएस कैडर में वरिष्ठता के आधार पर कई अधिकारी वर्तमान में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं। 1993 बैच के अशोक तिवारी के अलावा इसी बैच के अनुराग गर्ग वर्तमान में केंद्र में सेवाएं दे रहे हैं और उनकी सेवानिवृत्ति 31 जुलाई 2027 को होनी है। इसी बैच के ऋत्विक रुद्रा भी दिल्ली में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। इनके बाद 1994 बैच के राकेश अग्रवाल और 1995 बैच के सतींद्र पाल सिंह व एन वेगुगोपाल भी केंद्र में महत्वपूर्ण पदों पर तैनात हैं। इन अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की अवधि भी 2027 से 2029 के बीच है।
राज्य में मौजूद अधिकारियों की बात करें तो 1996 बैच की आइपीएस अधिकारी सतवंत अटवाल का नाम भी काफी महत्वपूर्ण है। उन्हें पहले भी कार्यकारी पुलिस महानिदेशक के पद पर नियुक्त किया जा चुका है और वर्तमान में वे गृह रक्षा एवं नागरिक सुरक्षा विभाग के प्रभारी के रूप में कार्य कर रही हैं। सतवंत अटवाल की सेवानिवृत्ति अगस्त 2031 में होनी है, जो उन्हें लंबी अवधि के लिए एक मजबूत दावेदार बनाती है। हालांकि, यूपीएससी द्वारा तैयार किए जाने वाले पैनल में वरिष्ठता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है ताकि किसी भी योग्य अधिकारी के अधिकारों का हनन न हो।
विधिक जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इन सख्त आदेशों के बाद अब यूपीएससी राज्यों को डीजीपी के चयन के लिए कड़े निर्देश जारी करेगा। हिमाचल प्रदेश सरकार को भी अब उन अधिकारियों की सूची यूपीएससी को भेजनी होगी जो इस पद की पात्रता रखते हैं। इसमें वे अधिकारी भी शामिल होंगे जो वर्तमान में केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर हैं, क्योंकि पैनल तैयार करते समय पूरे कैडर की वरिष्ठता देखी जाती है। यदि प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी वापस आने की इच्छा जताते हैं या यूपीएससी उन्हें उपयुक्त पाता है, तो उनमें से भी किसी की नियुक्ति नियमित आधार पर की जा सकती है।
कार्यकारी डीजीपी की नियुक्ति को लेकर समय-समय पर प्रशासनिक हलकों में चर्चा होती रही है। आठ माह से नियमित डीजीपी न होने के कारण पुलिस विभाग के कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय और प्रशासनिक सुधार प्रभावित हो रहे थे। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने यूपीएससी को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और निगरानी करने का अधिकार दे दिया है, तो उम्मीद है कि मार्च या अप्रैल माह तक हिमाचल प्रदेश को अपना नया नियमित पुलिस महानिदेशक मिल जाएगा। इससे न केवल विभाग में स्थिरता आएगी, बल्कि कानून-व्यवस्था के संचालन में भी मजबूती मिलेगी। प्रशासन अब उन नामों पर विचार कर रहा है जिन्हें यूपीएससी के समक्ष पैनल के रूप में भेजा जाना है।