नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मैदान पर भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मुकाबलों को लेकर हमेशा से ही रोमांच चरम पर रहता है, लेकिन वर्तमान में खेल से ज्यादा प्रशासनिक विवाद सुर्खियों में हैं। आगामी टी20 विश्व कप 2026 से पहले दोनों देशों के बीच संबंधों और मैचों के आयोजन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस पूरे मामले में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के पूर्व अधिकारी और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) के पूर्व मीडिया निदेशक समी उल हसन बर्नी ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और आईसीसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बर्नी का मानना है कि यदि कुछ मामलों को सार्वजनिक करने के बजाय शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा लिया जाता, तो आज भारत और पाकिस्तान के बीच मैच के बहिष्कार जैसी नौबत नहीं आती।
समी उल हसन बर्नी ने विशेष रूप से बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान के मामले का उल्लेख करते हुए बीसीसीआई की रणनीति की आलोचना की है। उनका तर्क है कि अगर बीसीसीआई मुस्तफिजुर रहमान को रिलीज करने का आदेश देने जैसे मुद्दों को चुपचाप सुलझा लेता और अनावश्यक सार्वजनिक बयानबाजी से बचता, तो स्थिति इतनी तनावपूर्ण नहीं होती। बर्नी के अनुसार, क्रिकेट प्रशासकों को ऐसे संवेदनशील मामलों में अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी। उनका कहना है कि सार्वजनिक संचार और अनावश्यक घोषणाओं ने आग में घी डालने का काम किया है, जिससे क्रिकेट जगत में कड़वाहट बढ़ी है और पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ मैचों के बहिष्कार की चर्चा शुरू हो गई है।
बर्नी ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत के दौरान स्पष्ट किया कि कभी-कभी प्रशासकों द्वारा लिए गए गलत फैसले और उनके द्वारा दी गई टिप्पणियों का असर बहुत व्यापक और हानिकारक होता है। उन्होंने 3 जनवरी को की गई एक घोषणा को इसी तरह की प्रशासनिक चूक का परिणाम बताया। बर्नी का लंबा अनुभव रहा है; उन्होंने न केवल पत्रकार के रूप में ‘डॉन’ अखबार में अपनी सेवाएं दी हैं, बल्कि दुबई स्थित आईसीसी मुख्यालय में भी 10 वर्षों से अधिक समय तक काम किया है। इसके अलावा, पिछले साल तक वे पीसीबी के मीडिया निदेशक के रूप में भी कार्यरत थे। अपने इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने आईसीसी की कार्यप्रणाली में निरंतरता की कमी की ओर इशारा किया है।
इस विवाद में पीसीबी के वर्तमान अध्यक्ष मोहसिन नकवी के रुख को भी बर्नी ने मजबूती से सामने रखा है। नकवी का मानना है कि आईसीसी द्वारा बांग्लादेश के मैचों को भारत से श्रीलंका स्थानांतरित न करने का निर्णय पूरी तरह गलत और भेदभावपूर्ण है। उनके अनुसार, आईसीसी के पिछले फैसलों और मौजूदा रुख में भारी विरोधाभास है। नकवी ने इसे ‘दोहरा मापदंड’ करार देते हुए कहा है कि जब भारत से संबंधित मामले होते हैं, तो नियम अलग तरह से लागू किए जाते हैं, लेकिन जब बांग्लादेश या अन्य देशों की बात आती है, तो आईसीसी के तेवर बदल जाते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था बड़े देशों के दबाव में काम कर रही है, जिससे खेल की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
मैच के बहिष्कार के आर्थिक परिणामों को लेकर भी क्रिकेट जगत में गहन चर्चा हो रही है। आईसीसी ने संकेत दिए हैं कि यदि पाकिस्तान बहिष्कार का रास्ता चुनता है, तो उसे भारी वित्तीय जुर्माने और राजस्व के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। यह नुकसान लाखों-करोड़ों डॉलर तक जा सकता है। हालांकि, बर्नी का कहना है कि पाकिस्तान ने इतना बड़ा कदम उठाने से पहले निश्चित रूप से सभी कानूनी और विशेषज्ञ सलाह ली होगी। उन्होंने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश करते हुए कहा कि यदि भारत के खिलाफ एक भी मैच रद्द होता है, तो इससे लगभग 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो सकता है। यह राशि पाकिस्तान के वार्षिक राजस्व (35.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के मुकाबले कहीं अधिक बड़ी है।
इतने बड़े वित्तीय अंतर के बावजूद, बर्नी ने पाकिस्तान के संघर्ष करने की क्षमता पर भरोसा जताया है। उन्होंने याद दिलाया कि साल 2009 से 2019 के बीच पाकिस्तान ने अपने घरेलू मैदानों पर क्रिकेट न होने और अत्यधिक आर्थिक तंगी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित किया है। उस कठिन दौर में भी पाकिस्तान ने 2009 का टी20 विश्व कप और 2017 की चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर यह दिखा दिया था कि वे भारी दबाव और संसाधनों की कमी के बावजूद सर्वाइव कर सकते हैं और जीत भी हासिल कर सकते हैं। बर्नी का तर्क है कि पाकिस्तान का क्रिकेट इतिहास गवाह है कि वे मुश्किल परिस्थितियों में और भी निखरकर सामने आते हैं।
वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यह स्पष्ट है कि बीसीसीआई और पीसीबी के बीच की यह खींचतान अब केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक प्रशासनिक और रणनीतिक युद्ध का रूप ले चुकी है, जिसमें आईसीसी की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं। समी उल हसन बर्नी के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि क्रिकेट प्रशासकों के बीच संवाद की कमी और भेदभावपूर्ण रवैये ने खेल के सबसे बड़े मुकाबले को खतरे में डाल दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि आईसीसी इस गतिरोध को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाती है और क्या टी20 विश्व कप 2026 में दर्शक एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच रोमांचक मुकाबला देख पाएंगे या यह विवाद क्रिकेट इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज होगा। फिलहाल, पाकिस्तान के कड़े रुख और बीसीसीआई की चुप्पी ने इस मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है।