नई दिल्ली। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित ऐतिहासिक लाहौर किले के भीतर एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक उपलब्धि हासिल हुई है। यहाँ भगवान राम के पुत्र लव को समर्पित प्राचीन लौह मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। मंदिर के संरक्षण के बाद अब इस ऐतिहासिक स्थल को आम जनता और पर्यटकों के लिए आधिकारिक रूप से खोल दिया गया है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, लाहौर शहर की स्थापना और इसका नामकरण भगवान राम के पुत्र लव के नाम पर ही हुआ माना जाता है, जिससे इस मंदिर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा हो जाता है।
इस पूरे जीर्णोद्धार अभियान का नेतृत्व ‘वाल्ड सिटी लाहौर प्राधिकरण’ (डब्ल्यूसीएलए) द्वारा किया गया। प्राधिकरण ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि यह परियोजना केवल लौह मंदिर तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें किले के भीतर मौजूद अन्य ऐतिहासिक संरचनाओं को भी नए सिरे से संवारा गया है। इस अभियान के तहत सिख शासनकाल के दौरान निर्मित शाही हम्माम और महाराजा रणजीत सिंह के प्रसिद्ध ‘अठदारा पैविलियन’ का भी वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया गया है। इन स्थलों का पुनरुद्धार ऐतिहासिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम माना जा रहा है।
परियोजना को ‘अगा खान कल्चरल सर्विस पाकिस्तान’ के तकनीकी और वित्तीय सहयोग से पूरा किया गया है। प्राधिकरण के अनुसार, लौह मंदिर परिसर के भीतर खुले आकाश वाले क्षेत्र और महत्वपूर्ण स्मारक स्थलों का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि उनकी प्राचीन भव्यता बनी रहे। जीर्णोद्धार के दौरान इस बात की पूरी सावधानी बरती गई कि इन ऐतिहासिक संरचनाओं के मूल स्वरूप और निर्माण कला में कोई अनपेक्षित बदलाव न आए। इसके लिए आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ पारंपरिक निर्माण शैलियों का बेहतर समन्वय किया गया, जिससे मंदिर और अन्य भवन अपनी पुरानी पहचान के साथ वापस सुरक्षित हो सकें।
प्राधिकरण की प्रवक्ता तानिया कुरेशी ने इस पहल के उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लाहौर किला विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का एक अद्भुत संगम रहा है। यहाँ हिंदू और सिख धार्मिक स्थलों के साथ-साथ मुगलों द्वारा निर्मित भव्य मस्जिदें और ब्रिटिश काल की संरचनाएं भी मौजूद हैं। इस बहुस्तरीय विरासत को दुनिया के सामने लाना और इसे नष्ट होने से बचाना ही प्रशासन का मुख्य लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि संरक्षण की इस प्रक्रिया ने किले की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती प्रदान की है।
इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व की पहचान में शोधकर्ताओं का भी बड़ा योगदान रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष अमेरिका के प्रसिद्ध सिख शोधकर्ता तरुनजीत सिंह बुतालिया ने लाहौर किले के भीतर गहन अध्ययन किया था। उन्होंने अपने शोध के दौरान सिख शासनकाल (1799-1849) के दौरान निर्मित लगभग 100 छोटे-बड़े स्मारकों की पहचान की थी। इस विस्तृत पहचान के बाद ही कई महत्वपूर्ण ढांचों के संरक्षण की रूपरेखा तैयार की गई थी।
इतिहासकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि लौह मंदिर का जीर्णोद्धार न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह इस क्षेत्र की साझी विरासत को सहेजने का एक बड़ा प्रयास है। इस तरह के कार्यों से आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास और विभिन्न संस्कृतियों के आपसी जुड़ाव को समझने का बेहतर अवसर मिलेगा। लाहौर किले में स्थित ये स्मारक अब न केवल शोधार्थियों के लिए बल्कि वैश्विक पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरेंगे। इस पहल से पाकिस्तान में प्राचीन धरोहरों के प्रति एक नई संवेदनशीलता दिखाई दे रही है।
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