वाराणसी। नाबालिग से दुष्कर्म के संगीन मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम बापू को छह माह की अंतरिम जमानत मिलने के बाद उनकी वाराणसी यात्रा विवादों के घेरे में आ गई है। जेल की सलाखों से बाहर आने के बाद आसाराम फिलहाल धर्मनगरी काशी में हैं, लेकिन बाबा विश्वनाथ के दरबार में उनके दर्शन-पूजन के तरीके और उन्हें दिए गए कथित ‘वीआइपी ट्रीटमेंट’ ने सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है। विशेष रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर के गेट नंबर चार से उनकी वीआइपी एंट्री और पुलिस की भारी सुरक्षा घेराबंदी के बीच उनकी गाड़ी का मंदिर के द्वार तक पहुंचने को लेकर लोग प्रशासन से सवाल पूछ रहे हैं। जनता के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर एक सजायाफ्ता अपराधी को इतनी विशिष्ट खातिरदारी क्यों दी जा रही है।
बाबा दरबार में दर्शन और वीआइपी प्रोटोकॉल का विवाद
आसाराम बापू जब बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंचे, तो वहां की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों और सोशल मीडिया पर वायरल सूचनाओं के अनुसार, आसाराम बापू को मंदिर के गेट नंबर चार से प्रवेश दिया गया, जो आमतौर पर अतिविशिष्ट अतिथियों के लिए आरक्षित रहता है। सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर जताई जा रही है कि पुलिस की सुरक्षा अभिरक्षा में उनकी गाड़ी को सीधे गेट के पास तक जाने की अनुमति दी गई, जबकि आम श्रद्धालुओं को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। मंदिर के भीतर भी उन्हें अलग से दर्शन कराए जाने की खबरें सामने आई हैं। इंटरनेट पर लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या न्यायपालिका द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति के लिए नियम बदल जाते हैं?
इस मामले में मंदिर प्रशासन ने अपनी सफाई पेश की है। मंदिर प्रशासन का कहना है कि आसाराम बापू के लिए कोई आधिकारिक वीआइपी प्रोटोकॉल जारी नहीं किया गया था और उन्हें एक सामान्य नागरिक की तरह ही दर्शन करने की अनुमति दी गई थी। वहीं, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मंदिर परिसर और उसके आसपास श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय स्थिति को टालने के लिए पुलिस बल की तैनाती की गई थी। हालांकि, पुलिस और प्रशासन के ये तर्क प्रदर्शन के दौरान दिखाई गई सक्रियता से मेल नहीं खा रहे, जिससे विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
अनौरा आश्रम में अनुयायियों का भारी हुजूम
वाराणसी के हरहुआ स्थित अनौरा गांव में बना संत आसाराम बापू आश्रम, जो पिछले 12 वर्षों से सन्नाटे में डूबा था, वहां एक बार फिर भारी हलचल देखी जा रही है। 2013 में आसाराम की गिरफ्तारी के बाद से यहां सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उनके आगमन की खबर मिलते ही पूर्वांचल के जिलों जैसे जौनपुर, भदोही, मीरजापुर, आजमगढ़, गाजीपुर, चंदौली सहित पड़ोसी राज्य बिहार से हजारों की संख्या में अनुयायी उमड़ पड़े। आश्रम परिसर के बाहर लग्जरी गाड़ियों का लंबा काफिला और समर्थकों का हुजूम देखकर ऐसा लग रहा था मानो समय एक दशक पीछे लौट गया हो।
आश्रम में सुरक्षा और गोपनीयता के कड़े इंतजाम
आश्रम प्रशासन ने आसाराम की मौजूदगी को पूरी तरह गोपनीय और सुरक्षित रखने के लिए अभूतपूर्व इंतजाम किए थे। आश्रम के भीतर की कोई भी तस्वीर या वीडियो बाहर न जाए, इसके लिए सेवादारों को सख्त निर्देश दिए गए थे। सत्संग हॉल में प्रवेश करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की गहन तलाशी ली जा रही थी और उनके पहचान पत्र जमा करने के साथ-साथ मोबाइल फोन मुख्य द्वार पर ही जमा करा लिए जा रहे थे। यदि कोई व्यक्ति छिपकर मोबाइल ले जाने या वीडियो बनाने की कोशिश करता पाया गया, तो उसे तत्काल रोककर फुटेज डिलीट करवाई गई। यही कारण है कि उनकी बेहद कम तस्वीरें ही सार्वजनिक हो सकी हैं।
व्यास पीठ से संबोधन और आध्यात्मिक गतिविधियां
रविवार को आसाराम बापू ने आश्रम में स्थित व्यास पीठ से अपने अनुयायियों को संबोधित किया। लंबे अंतराल के बाद अपने गुरु को सामने पाकर समर्थक भावुक नजर आए। आश्रम में उनके प्रवास के दौरान कई धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए गए। रविवार दोपहर करीब दो बजे आसाराम का काफिला अनौरा आश्रम से निकलकर अलईपुरा स्थित शहर के दूसरे आश्रम के लिए रवाना हुआ। सूत्रों का कहना है कि वे गंगा किनारे किसी शांत स्थान पर समय बिताने और आध्यात्मिक शांति के लिए भी गए थे। उनके शहर के भीतर आवागमन के दौरान भी पुलिस की गाड़ियां सुरक्षा कवच की तरह साथ रहीं, जिसने वीआइपी ट्रीटमेंट की चर्चा को और बल दिया।
जनता के मन में उठते गंभीर सवाल
आसाराम बापू को मिली इस विशिष्ट सुविधा पर बनारस के प्रबुद्ध समाज और आम नागरिकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया है। एक ओर जहां उनके समर्थक इसे अपनी आस्था का विषय बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कानून के जानकार और आम लोग इसे न्याय प्रणाली और प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रहार मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि एक व्यक्ति जो नाबालिग से दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध में उम्रकैद की सजा काट रहा है, उसे जमानत पर बाहर आने के बाद भी एक ‘रॉकस्टार’ या ‘वीआइपी’ जैसा सम्मान मिलना समाज के लिए गलत संदेश है। क्या पुलिस की सुरक्षा और मंदिर प्रशासन का लचीला रुख केवल रसूखदार दोषियों के लिए ही होता है?
आसाराम बापू फिलहाल वाराणसी में ही हैं और उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। छह माह की यह अंतरिम जमानत उन्हें स्वास्थ्य कारणों के आधार पर मिली है, लेकिन उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों और वीआइपी दर्शन ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या धर्म और आस्था के नाम पर कानूनी सीमाओं और नैतिक मानदंडों को दरकिनार किया जा सकता है। पुलिस और प्रशासन भले ही इसे भीड़ प्रबंधन बता रहे हों, लेकिन वाराणसी की गलियों में हो रही चर्चाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।