शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बुधवार को प्रश्नकाल में ‘विधायक क्षेत्र विकास निधि’ (एमएलए फंड) का मुद्दा गरमा गया। विपक्षी दल भाजपा ने सरकार पर विधायकों के अधिकारों का हनन करने और विकास कार्यों को रोकने का गंभीर आरोप लगाया। वहीं, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रदेश की डगमगाती आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए भविष्य में विधायक निधि की राशि में कटौती करने के संकेत दिए, जिससे सदन में सियासी माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया।
विपक्ष के सदस्य प्रकाश राणा ने इस मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया कि जब बजट में विधायक निधि के लिए स्पष्ट प्रावधान किया गया है, तो अक्टूबर माह के बाद से यह राशि जारी क्यों नहीं की गई। उन्होंने तर्क दिया कि विधायक निधि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे बुनियादी विकास कार्यों जैसे रास्तों, नालियों और सामुदायिक केंद्रों की मरम्मत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। फंड के अभाव में ये सभी कार्य अधर में लटके हुए हैं, जिससे जनता को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी सदस्यों ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार बताते हुए कहा कि सरकार जानबूझकर जनप्रतिनिधियों को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए राज्य की वित्तीय चुनौतियों को विस्तार से सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद किए जाने के कारण हिमाचल प्रदेश को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की वर्तमान वित्तीय स्थिति को देखते हुए बजट का प्रबंधन करना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि उन्होंने आश्वासन दिया कि चालू वित्त वर्ष की शेष विधायक निधि और ऐच्छिक निधि को जारी करने पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि भविष्य में वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए विधायक निधि की राशि घटानी पड़ सकती है।
चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने भाजपा विधायकों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर प्रदेश के हितों के लिए एकजुट होने की अपील की। उन्होंने आग्रह किया कि भाजपा विधायक दल को राजस्व घाटा अनुदान की बहाली के मुद्दे पर राज्य सरकार का समर्थन करना चाहिए और केंद्र के समक्ष मजबूती से पक्ष रखना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह केवल उनकी सरकार की लड़ाई नहीं है, बल्कि प्रदेश के चहुंमुखी विकास का सवाल है।
विधानसभा में हुई इस तीखी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में वित्तीय संकट और विधायक निधि को लेकर सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ने वाला है। विपक्ष इसे अधिकारों में कटौती के रूप में देख रहा है, जबकि सरकार इसे आर्थिक मजबूरी और संतुलन का नाम दे रही है। फिलहाल इस मुद्दे ने बजट सत्र की कार्यवाही में खलबली मचा दी है और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार वास्तव में विधायक निधि पर ‘कैंची’ चलाने का निर्णय लेती है या विपक्ष के दबाव में पीछे हटती है।