शिमला। भारत निर्वाचन आयोग ने हिमाचल प्रदेश की राज्यसभा सीट के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है, जिससे प्रदेश का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। वर्तमान सांसद इंदु गोस्वामी का कार्यकाल समाप्त होने के कारण यह सीट रिक्त हो रही है, जिस पर आगामी 16 मार्च को मतदान और उसी दिन मतगणना संपन्न होगी। आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, चुनाव प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत 26 फरवरी को नोटिफिकेशन जारी होने के साथ होगी। इच्छुक उम्मीदवार 5 मार्च तक अपना नामांकन दाखिल कर सकेंगे।
राज्यसभा चुनाव की घोषणा होते ही प्रदेश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों—कांग्रेस और भाजपा—ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। विशेष रूप से भाजपा की रणनीति ‘वेट एंड वॉच’ की नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा पहले यह देखना चाहती है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस किसे अपना उम्मीदवार बनाती है। यदि कांग्रेस किसी बाहरी चेहरे को मैदान में उतारती है, जैसा कि पिछली बार हुआ था, तो भाजपा इसका कड़ा विरोध करते हुए अपनी पूरी ताकत झोंक सकती है। भाजपा के संभावित उम्मीदवारों की सूची में इंदु गोस्वामी को दोबारा मौका मिलने या ऊना के कुटलैहड़ से पूर्व विधायक वीरेंद्र कंवर को उतारने की चर्चाएं हैं, हालांकि भाजपा अपने चौंकाने वाले फैसलों के लिए जानी जाती है।
विधानसभा के वर्तमान संख्या बल पर नजर डालें तो सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास 40 विधायकों के साथ स्पष्ट बढ़त है, जबकि भाजपा के पास 28 विधायक हैं। हालांकि, आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में दिख रहे हैं, लेकिन पिछला राज्यसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक कड़वा सबक रहा है। पिछली बार भी कांग्रेस के पास 40 विधायक थे, फिर भी क्रॉस वोटिंग के कारण मुकाबला इतना रोमांचक हो गया था कि कांग्रेस को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था। इसी अनुभव को देखते हुए भाजपा इस बार भी किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठी है।
कांग्रेस खेमे में भी प्रत्याशियों के नामों को लेकर मंथन तेज है। चर्चा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह को उम्मीदवार बनाया जा सकता है। इसके अलावा, वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा और प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल के नामों पर भी विचार हो रहा है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना और किसी भी प्रकार के आंतरिक असंतोष को रोकना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल एक सीट का मुकाबला नहीं है, बल्कि दोनों दलों के लिए अपनी संगठनात्मक शक्ति और रणनीतिक चातुर्य साबित करने की परीक्षा है। चूंकि राज्यसभा का चुनाव गुप्त मतपत्र से होता है, इसलिए विधायकों की वरीयता और अंतरात्मा की आवाज परिणामों को प्रभावित कर सकती है। यदि कांग्रेस के भीतर कोई असंतोष उभरता है, तो भाजपा निश्चित रूप से उस अवसर का लाभ उठाने का प्रयास करेगी। 16 मार्च का दिन हिमाचल की राजनीति में एक बार फिर रणनीतिक दांव-पेच और रोमांचक मुकाबले का गवाह बनेगा।