नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुए व्यापार समझौते ने भारतीय निर्यातकों के लिए उम्मीदों के नए द्वार खोल दिए हैं। इस महत्वपूर्ण डील के बाद वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की स्थिति न केवल मजबूत हुई है, बल्कि निर्यातकों को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में मजबूती से टिके रहने का अवसर मिल गया है। पिछले कुछ समय से व्यापारिक अनिश्चितता के कारण भारतीय निर्यातक काफी दबाव में थे। विशेष रूप से वे निर्यातक जो गर्मियों के सीजन के लिए अपने कंटेनर अमेरिका भेज चुके थे, वे अगले सीजन के ऑर्डर्स को लेकर गहरी चिंता में डूबे हुए थे। उन्हें डर था कि बदली हुई व्यापारिक नीतियों के कारण उनके पुराने ग्राहक कहीं छिटक न जाएं।
इस संकट की शुरुआत तब हुई जब डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की संभावना जताई गई थी। इस घोषणा के बाद से ही भारतीय निर्यात बाजार में हड़कंप मच गया था। बीते कुछ महीनों का रुझान देखें तो पता चलता है कि छोटे स्तर के निर्यातकों ने संभावित आर्थिक नुकसान से बचने के लिए अमेरिका की ओर जाने वाले अपने शिपमेंट को लगभग पूरी तरह से रोक दिया था। हालांकि, कुछ बड़े निर्यातक बाजार में अपनी साख बचाए रखने के लिए घाटा उठाकर भी शिपमेंट जारी रखे हुए थे, लेकिन उनके लिए भी यह लंबे समय तक संभव नहीं था। अब 18 प्रतिशत टैरिफ के नए एलान ने इस पूरी तस्वीर को बदल दिया है। इस फैसले के बाद यह माना जा रहा है कि अमेरिकी बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग और धमक एक बार फिर पहले की तरह दिखाई देगी।
इस समझौते की बारीकियों पर नजर डालें तो भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए यह एक बड़ी राहत के रूप में उभरा है। वर्तमान में अमेरिकी बाजार में भारत के मुख्य प्रतिस्पर्धी देशों जैसे बांग्लादेश और श्रीलंका के कपड़ों पर 20 प्रतिशत तक का टैक्स लग रहा है। इसके मुकाबले भारत पर लगने वाला टैक्स कम होने से भारतीय गारमेंट्स अमेरिकी खरीदारों के लिए पहली पसंद बन सकते हैं। केवल कपड़ा ही नहीं, बल्कि कालीन उद्योग में भी भारत को इसका सीधा लाभ मिलने वाला है। यहाँ भारत का मुख्य मुकाबला तुर्किए जैसे देशों से है। इसी तरह समुद्री खाद्य पदार्थों, विशेषकर झींगा मछली के निर्यात में भी भारत को बड़ी बढ़त मिलने की उम्मीद है। अमेरिकी बाजारों में बिकने वाला भारतीय झींगा अब अन्य देशों के मुकाबले काफी किफायती और प्रतिस्पर्धी दरों पर उपलब्ध होगा।
रत्न और आभूषण (जेम्स एंड ज्वेलरी) क्षेत्र के लिए भी यह ट्रेड डील किसी संजीवनी से कम नहीं है। वैश्विक व्यापार युद्ध के समीकरणों को देखें तो अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर 34 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ लगा रखा है। इसके विपरीत, भारत के उत्पादों पर मात्र 18 प्रतिशत टैरिफ का होना भारतीय आभूषणों के लिए एक बड़ा अवसर पैदा करता है। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं के बीच भारतीय आभूषणों की मांग में भी भारी इजाफा होने की संभावना है। हालांकि, व्यापार जगत के जानकारों का कहना है कि यह स्थिति पूरी तरह से बाधा मुक्त नहीं है। अभी भी ऑटो पार्ट्स और मेटल जैसे कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर सेक्टोरल टैरिफ प्रभावी बने रहेंगे, जिससे इन उद्योगों को अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव करना पड़ सकता है।
व्यापारिक आंकड़ों का विश्लेषण करें तो भारत की स्थिति पहले से ही काफी सकारात्मक रही है। अप्रैल से नवंबर के बीच अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 11.3 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई थी, जिससे कुल निर्यात का आंकड़ा 59 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया था। इस विकास में सबसे बड़ी भूमिका स्मार्टफोन उद्योग ने निभाई है, जिसका शिपमेंट दोगुना होकर 16.7 बिलियन डॉलर तक जा पहुँचा। दिलचस्प बात यह है कि जब ट्रंप ने दुनिया भर के देशों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी, तब भी इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे भारत के लगभग 40 प्रतिशत निर्यात क्षेत्रों पर इसका कोई खास नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती और उत्पादों की गुणवत्ता को दर्शाता है।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भारत ने अपनी रणनीति में भी व्यापक बदलाव किए हैं। भारतीय नीति निर्माताओं ने केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपने निर्यात बाजार में विविधता लाने पर जोर दिया है। इसी दिशा में भारत ने यूनाइटेड किंगडम (यूके) और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के साथ भी महत्वपूर्ण ट्रेड डील साइन की हैं। बाजार के विविधीकरण की इस दूरगामी सोच का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य में यदि अमेरिका की नीतियों में ट्रंप की ओर से कोई अप्रत्याशित उलटफेर होता भी है, तो भारतीय निर्यातकों को बहुत बड़े संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ अनसुलझे पहलू भी हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया के माध्यम से भारत के साथ हुई इस ट्रेड डील को लेकर कई दावे किए हैं। इन दावों में उन्होंने व्यापारिक शर्तों और समझौतों को लेकर अपनी जीत बताई है। फिलहाल इन सोशल मीडिया पोस्ट्स और दावों पर भारतीय अधिकारियों की ओर से कोई विस्तृत या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। भारतीय खेमा इस समय पूरी सतर्कता के साथ समझौते के हर बिंदु का अध्ययन कर रहा है। कुल मिलाकर, इस डील ने भारतीय निर्यातकों के मन से डर को निकालकर उन्हें नए उत्साह के साथ अमेरिकी बाजार में उतरने के लिए तैयार कर दिया है। आने वाले महीनों में इसके परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकते हैं।