काठमांडू। नेपाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। जिस ‘जेन-जी’ (Gen-Z) यानी युवा पीढ़ी के समर्थन के दम पर बालेन शाह ने सत्ता की कुर्सी संभाली थी, अब वही युवा उनके खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। नेपाल में नई सरकार का गठन हुए अभी 150 दिन भी नहीं बीते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री बालेन शाह चौतरफा दबाव में घिर गए हैं। उन्हें न केवल आम जनता के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि संसद के भीतर विपक्ष और खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है।
बालेन शाह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के महज दो महीने बाद ही काठमांडू का माइतीघर मंडला एक बार फिर विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया है। बड़ी संख्या में युवा प्रदर्शनकारी वहां जमा होकर बालेन शाह के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। युवाओं का आरोप है कि जिन उम्मीदों के साथ उन्होंने इस नई सरकार को चुना था, बालेन शाह उन पर खरे नहीं उतर रहे हैं।
संसद से दूरी बनी नाराजगी की वजह
सदन के भीतर भी बालेन शाह की स्थिति सहज नहीं है। विपक्षी सांसदों ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ी आपत्ति उनकी संसद से निरंतर गैर-मौजूदगी को लेकर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सरकार बनने के बाद से अब तक संसद की 39 बैठकें हुई हैं, जिनमें से बालेन शाह केवल पांच में ही शामिल हुए हैं। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पीकर डोल प्रसाद अर्याल ने उन्हें 26 अगस्त को संसद में पेश होने और सांसदों के सवालों का जवाब देने का निर्देश जारी किया है। विपक्षी दलों का कहना है कि प्रधानमंत्री का संसद से इस तरह गायब रहना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है।
विवादित फैसले और चुनौतियां
बालेन शाह की सरकार के कुछ हालिया फैसलों ने आग में घी डालने का काम किया है। विशेष रूप से भारत-नेपाल सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने के उनके निर्णय का सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त विरोध हुआ। विरोध इतना उग्र था कि प्रशासन को इस फैसले में ढील देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, भारत के साथ सीमा विवाद पर दिए गए उनके बयानों की भी तीखी आलोचना हुई है।
| बालेन शाह सरकार के लिए बड़ी चुनौतियां |
| सीमा शुल्क विवाद: भारत-नेपाल सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने के फैसले से सीमावर्ती कस्बों में प्रदर्शन। |
| संसदीय अनुपस्थिति: 39 में से केवल 5 बैठकों में हिस्सा लेने पर स्पीकर द्वारा तलब किया जाना। |
| सांप्रदायिक तनाव: दक्षिणी नेपाल में हुई हिंसक झड़पों पर सरकार की देरी से आई प्रतिक्रिया। |
| गोरखा भर्ती: ‘अग्निपथ’ योजना के तहत भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की रुकी हुई भर्ती का मुद्दा। |
पार्टी के भीतर भी बढ़ता असंतोष
बालेन शाह के लिए सबसे बड़ी चिंता उनकी अपनी पार्टी ‘आरएसपी’ (RSP) के भीतर बढ़ती दरार है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सांसदों ने शाह के एकतरफा काम करने के तरीके और संगठन से उनकी बढ़ती दूरी पर नाराजगी जाहिर की है। आरएसपी सांसद जगदीश खरेल ने संसद में सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर सरकार सिर्फ प्रधानमंत्री की गरिमा बचाने में लगी रहेगी, तो वह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी। उन्होंने जोर दिया कि सदन और पार्टी के अन्य सदस्यों की गरिमा का सम्मान करना भी अनिवार्य है।
वहीं, पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों ने भारतीय सेना की ‘अग्निपथ’ योजना को लेकर अपना आंदोलन जारी रखा है। वे रुकी हुई भर्ती प्रक्रिया का तत्काल समाधान चाहते हैं। इन तमाम मुद्दों और दक्षिणी नेपाल में हाल ही में हुई सांप्रदायिक झड़पों ने बालेन शाह की प्रशासनिक क्षमता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब सबकी नजरें 26 अगस्त पर टिकी हैं, जब उन्हें संसद में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
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