नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने एनएएलएसएआर (NALSAR) लॉ यूनिवर्सिटी विवाद पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि छात्रों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने साफ लहजे में कहा कि इस प्रक्रिया में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को हस्तक्षेप करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी उस विवादास्पद सर्कुलर पर गहरी नाराजगी जताई, जिसमें 2026 बैच के एनएएलएसएआर छात्रों के वकील के रूप में पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) पर रोक लगाने की बात कही गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने बीसीआई के इस कदम को अनावश्यक बताते हुए कहा कि यह मामला सीधे तौर पर उनके और छात्रों के बीच के संवाद से जुड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि बीसीआई जैसी बाहरी संस्था इस निजी बातचीत और मामले में दखल देने वाली कौन होती है?
| सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश |
| • छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति दर्ज करने और प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। |
| • एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी के किसी भी छात्र या प्रोफेसर के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। |
| • बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। |
| • अदालत ने बीसीआई से इस पूरे घटनाक्रम और उसके आदेश पर जवाब मांगा है। |
क्या था बीसीआई का ‘तुगलकी’ फरमान?
कानूनी शिक्षा के मानकों को तय करने वाली संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने हाल ही में एक ऐसा आदेश जारी किया था जिससे देशभर के कानून के छात्रों में डर का माहौल बन गया था। बीसीआई ने सभी राज्यों की बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद से शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों का ‘एडवोकेट’ के रूप में एनरोलमेंट न करें। हालांकि, इस फैसले का चौतरफा विरोध शुरू हो गया और सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए बीसीआई को महज कुछ घंटों के भीतर ही अपना यह विवादित आदेश वापस लेना पड़ा।
विवाद की मुख्य जड़
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई थी जब एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने आगामी दीक्षांत समारोह को लेकर एक अभियान चलाया था। ये छात्र दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति का विरोध कर रहे थे। छात्रों के इसी विरोध प्रदर्शन को बीसीआई ने अनुशासनहीनता माना और मामले की जांच शुरू कर दी। इसी जांच के आधार पर छात्रों के भविष्य और उनके वकालत के करियर पर रोक लगाने जैसा कठोर फैसला लिया गया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराया है।
| मामले की पृष्ठभूमि |
| • एनएएलएसएआर छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश के शामिल होने का विरोध किया था। |
| • बीसीआई ने इसे अनुशासनहीनता मानकर छात्रों के वकालत पंजीकरण पर रोक लगा दी थी। |
| • भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद बीसीआई ने आदेश वापस लिया। |
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने न केवल एनएएलएसएआर के छात्रों को राहत दी है, बल्कि देश के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की अभिव्यक्ति की आजादी पर भी मुहर लगाई है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पेशेवर संस्थाएं अपनी शक्तियों का उपयोग छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं कर सकतीं। अब सभी की नजरें बीसीआई द्वारा अदालत में पेश किए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं। फिलहाल, यूनिवर्सिटी के छात्रों और प्रोफेसरों के लिए यह बड़ी राहत की खबर है कि उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम नहीं उठाया जा सकेगा।