Karanatka : कर्नाटक में नई सरकार गठन के तीन दिन भीतर ही उभरा असंतोष रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा

नई दिल्ली। कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व में सरकार के गठन को अभी महज तीन दिन ही बीते हैं कि कांग्रेस के भीतर कलह और असंतोष की खबरें सार्वजनिक होने लगी हैं। कैबिनेट विस्तार और विभागों के बंटवारे से नाराज एक वरिष्ठ मंत्री ने अपना इस्तीफा सौंप दिया है, जबकि कई अन्य दिग्गज नेताओं ने अपनी अनदेखी और छोटे विभाग मिलने पर नाराजगी जाहिर की है। इसके साथ ही, महिला और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर भी सरकार के भीतर और बाहर से दबाव बढ़ता जा रहा है।

सरकार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत शुक्रवार सुबह तब खड़ी हुई जब वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी ने कैबिनेट से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया। रेड्डी का दावा है कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने उनसे बेंगलुरु विकास विभाग देने का वादा किया था, लेकिन उन्हें सिंचाई मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी गई। 73 वर्षीय रेड्डी बीटीएम लेआउट सीट से आठ बार के विधायक हैं और कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा माने जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब वह कैबिनेट में किसी भी पद पर काम नहीं करेंगे और केवल विधायक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे। उनके इस फैसले के बाद बेंगलुरु में उनके समर्थकों ने डीके शिवकुमार के खिलाफ नारेबाजी की और उनके पोस्टर भी हटा दिए।

असंतोष की यह लहर केवल रेड्डी तक सीमित नहीं है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय मिलने से नाराज केएच मुनियप्पा ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी है। कोलार से सात बार सांसद रहे मुनियप्पा का कहना है कि उनकी वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें अधिक महत्वपूर्ण मंत्रालय मिलना चाहिए था। उन्होंने इस संबंध में राहुल गांधी और केंद्रीय नेतृत्व को पहले ही अवगत कराने की बात कही है। इसी तरह, ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज अपने विभाग के प्रशासनिक कार्यों और तबादलों में कथित दखलंदाजी से नाखुश बताए जा रहे हैं।

वहीं, लोक निर्माण विभाग की कमान संभाल रहे सतीश जारकीहोली ने एक नई मांग रख दी है। उनका कहना है कि वह मंत्री पद के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (केपीसीसी) का पद भी चाहते थे और इसके लिए उन्होंने हाईकमान के सामने अपनी इच्छा व्यक्त की है। दूसरी ओर, पहले चरण में जगह न पाने वाले दिनेश गुंडू राव ने भी अपनी उपेक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें मंत्री न बनाए जाने का कारण पार्टी नेतृत्व को स्पष्ट करना चाहिए।

राजनीतिक विवादों के अलावा, सरकार को सामाजिक असंतुलन के मोर्चे पर भी घेरा जा रहा है। कैबिनेट में एक भी महिला मंत्री को शामिल न किए जाने पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता मार्गरेट अल्वा ने कड़ी निराशा जताई है। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि महिलाओं को उचित स्थान न मिलना सरकार की छवि के लिए ठीक नहीं है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर सरकार को महिला विरोधी बताकर हमलावर है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भरोसा दिया है कि जल्द होने वाले अगले विस्तार में महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।

मुस्लिम समुदाय की ओर से भी सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। मुस्लिम नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस की जीत में उनके समुदाय ने बड़ी भूमिका निभाई है, इसलिए उन्हें कम से कम चार मंत्री पद मिलने चाहिए। फिलहाल केवल यूटी खादर को ही कैबिनेट में जगह दी गई है। मुस्लिम धर्मगुरुओं और नेताओं ने बैठक कर अपनी भागीदारी बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। फिलहाल सरकार में 13 मंत्री शामिल हैं, जबकि 21 पद अब भी खाली हैं। डीके शिवकुमार के लिए इन रिक्त पदों के जरिए क्षेत्रीय, सामाजिक और व्यक्तिगत असंतोष को साधना एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है।

 

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