Special: खुद की काबिलियत पर शक और नाकामी का डर कहीं आप भी इम्पोस्टर सिंड्रोम के शिकार तो नहीं – The Hill News

Special: खुद की काबिलियत पर शक और नाकामी का डर कहीं आप भी इम्पोस्टर सिंड्रोम के शिकार तो नहीं

नई दिल्ली। क्या आपको भी अक्सर ऐसा लगता है कि आपकी सफलता केवल एक इत्तेफाक है? क्या कार्यक्षेत्र में छोटी सी चूक होने पर आप खुद को पूरी तरह अक्षम और नाकाम मानने लगते हैं? यदि तमाम उपलब्धियों और सराहना के बावजूद आप लगातार अपनी योग्यता पर संदेह करते हैं और खुद को ‘कमजोर’ महसूस करते हैं, तो आप इम्पोस्टर सिंड्रोम नाम की मानसिक स्थिति से जूझ रहे हो सकते हैं। यह समस्या व्यक्ति को हर समय इस डर में रखती है कि कहीं कोई उसकी ‘असलियत’ न जान ले कि वह उतना काबिल नहीं है, जितना लोग उसे समझते हैं।

दुनिया भर में करोड़ों लोग ओवरथिंकिंग की इस स्थिति से प्रभावित हैं। शोध बताते हैं कि यह समस्या विशेष रूप से महिलाओं और उन समूहों में अधिक देखी जाती है जो लंबे समय से हाशिए पर रहे हैं। यह मानसिक अवस्था व्यक्ति की कार्यक्षमता और उसके आत्मसम्मान को गहराई से चोट पहुंचाती है। अपनी छोटी-छोटी गलतियों के लिए खुद को पूरी तरह दोषी ठहराना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस नकारात्मक सोच को ‘कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी’ (सीबीटी) की मदद से बदला जा सकता है।

सीबीटी एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को उसके मस्तिष्क में चल रहे नकारात्मक विचारों को पहचानने और उन्हें चुनौती देने का कौशल सिखाती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इम्पोस्टर सिंड्रोम से बाहर निकलने के लिए सबसे पहले अपने नजरिए को बदलना अनिवार्य है। जब भी आपके मन में यह विचार आए कि “मैं इस नौकरी या पद के लायक नहीं हूं,” तो तुरंत रुकें और स्वयं से यह सवाल करें कि यदि आप अयोग्य थे, तो आपको यह अवसर मिला कैसे?

विशेषज्ञों का सुझाव है कि हमें अपने भीतर चल रहे संवाद की भाषा बदलनी होगी। खुद को यह कहने के बजाय कि “मैं असफल हूं,” यह कहना शुरू करें कि “मुझसे एक गलती हुई है।” यह छोटा सा भाषाई बदलाव मानसिक बोझ को काफी हद तक कम कर देता है और व्यक्ति को सुधार की दिशा में प्रेरित करता है। यह समझना बेहद जरूरी है कि मन में आने वाला हर डर हकीकत नहीं होता, बल्कि वह केवल दिमाग में उपजा एक साधारण विचार मात्र है।

इस समस्या से निपटने के लिए एक व्यावहारिक तरीका ‘मेंटल जिमिंग’ भी है। जिस तरह शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक व्यायाम जरूरी है, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक अभ्यास आवश्यक है। जब भी नकारात्मक विचार हावी होने लगें, तो उन्हें एक कागज पर लिखें और फिर उन्हें विपरीत क्रम में पढ़ें। यह तकनीक उन विचारों की तीव्रता को कम करने में मदद करती है।

यह बदलाव रातों-रात नहीं आता, इसके लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। यदि आप भी इस तरह के मानसिक तनाव का अनुभव कर रहे हैं, तो अपनी खूबियों को पहचानना और अपनी सफलताओं का जश्न मनाना शुरू करें। खुद को कोसने के बजाय अपनी काबिलियत पर भरोसा रखें और यह स्वीकार करें कि गलतियां करना सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है, न कि आपकी अयोग्यता का प्रमाण। अपनी मानसिक शांति के लिए हर छोटी त्रुटि को खुद पर हावी न होने दें।

 

Pls read:Delhi: नीट पेपर लीक मामले में राहुल गांधी ने सरकार को घेरा शिक्षा मंत्री को बर्खास्त करने की उठाई मांग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *