नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाई गई चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटाने के फैसले को केंद्र सरकार ने सही ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में सरकार ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुसार चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। सरकार ने तर्क दिया है कि चयन समिति में किसी न्यायिक सदस्य को शामिल करना संसद का विधायी विकल्प हो सकता है, लेकिन यह कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
पूरा विवाद 2023 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद शुरू हुआ था। उस समय पांच न्यायाधीशों की पीठ ने एक अंतरिम व्यवस्था दी थी कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बना लेती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, सीजेआई और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की जाएगी। इसके बाद संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें सीजेआई के स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया। अब इस नई समिति में प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं। इसी बदलाव की वैधता को अब शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई है।
सरकार ने याचिकाकर्ताओं के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि सीजेआई को हटाने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। सरकार ने कहा कि पिछले सात दशकों से भी अधिक समय से चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां पूरी तरह कार्यपालिका द्वारा की जाती रही हैं और इस दौरान देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कभी भी बाधित नहीं हुए। हलफनामे में कहा गया कि यह सोचना केवल एक कोरी कल्पना है कि कार्यपालिका द्वारा की गई नियुक्तियों में निष्पक्षता या संस्थागत स्वतंत्रता की कमी होती है।
केंद्र ने अदालत को बताया कि चयन समिति में विपक्ष के नेता की मौजूदगी और वरिष्ठ संवैधानिक अधिकारियों की भागीदारी अपने आप में पारदर्शिता की गारंटी है। यह मानना पूरी तरह गलत है कि संसद द्वारा विधिवत गठित समिति पक्षपाती होगी। सरकार के अनुसार, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे जनहित में पूरी निष्पक्षता और सद्भावना के साथ कार्य करेंगे। याचिकाकर्ताओं के इन आरोपों को “कानूनी रूप से अस्थिर” बताया गया कि सरकार की मंशा इस कानून के पीछे कपटपूर्ण थी।
सरकार ने जोर देकर कहा कि 2024 का यह नया कानून पिछली व्यवस्था के मुकाबले एक बड़ा सुधार है क्योंकि यह अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी प्रक्रिया प्रदान करता है। यह संविधान के अनुच्छेद 324(2) की मूल भावना के अनुरूप है। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि आज तक नियुक्त किए गए किसी भी चुनाव आयुक्त की योग्यता या उनकी कार्यप्रणाली पर कभी कोई गंभीर सवाल या आरोप नहीं लगे हैं।
अंत में सरकार ने कहा कि केवल अटकलों और अस्पष्ट दावों के आधार पर इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद बनाना अनुचित है। सरकार के अनुसार, चयन समिति का गठन संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें किसी विशेष सूत्र का पालन करना स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका नहीं है। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह संसद द्वारा बनाए गए इस कानून और सरकार के तर्कों को किस तरह स्वीकार करती है।
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