नई दिल्ली। आज हमारे चारों ओर खड़ी भव्य इमारतें, मीलों लंबी सड़कें और बाजारों में
उपलब्ध हर छोटी-बड़ी वस्तु उन करोड़ों गुमनाम हाथों की मेहनत का परिणाम है, जो बिना
थके दिन-रात पसीना बहाते हैं। मानव इतिहास के शुरुआती दौर से लेकर आज की अत्याधुनिक
डिजिटल दुनिया तक, मनुष्य की हर प्रगति की नींव में सिर्फ और सिर्फ ‘श्रम’ ही मौजूद
है। चाहे वह मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार हो या तपती धूप में खेतों को हरा-भरा
करने वाला किसान, हर श्रमिक इस समाज का वास्तविक शिल्पकार है।
वर्तमान समय में दफ्तरों या कारखानों में जो आठ घंटे काम करने का नियम हमें
स्वाभाविक लगता है, वह किसी उपहार के रूप में नहीं मिला, बल्कि
इसके पीछे एक लंबा और रक्तरंजित संघर्ष छिपा है। 19वीं सदी की औद्योगिक
क्रांति के दौरान मजदूरों का भीषण शोषण किया जाता था और उनसे जानवरों की
तरह दिन में 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था। इस अन्याय के खिलाफ 1
मई 1886 को अमेरिका में एक विशाल आंदोलन की शुरुआत हुई। मजदूरों की मांग अत्यंत
स्पष्ट थी— “आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन।”
शिकागो के हैमार्केट स्क्वायर में अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित
हुए मजदूरों पर हुई हिंसा ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। इस संघर्ष में कई
मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उनकी इसी शहादत और जज्बे को सम्मान देने के
लिए 1889 में पेरिस में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह निर्णय लिया
गया कि प्रत्येक वर्ष 1 मई को ‘अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ के रूप में मनाया
जाएगा।
भारत में भी मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए लंबा संघर्ष चला। ब्रिटिश शासन के
दौरान हो रहे शोषण के विरुद्ध 1920 में ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की
स्थापना की गई। भारत में पहली बार आधिकारिक तौर पर मजदूर दिवस 1 मई 1923 को मद्रास
(चेन्नई) में मनाया गया, जिसकी पहल ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ ने की थी।
आजादी के बाद संविधान में मजदूरों के अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए
न्यूनतम मजदूरी कानून और पीएफ जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए।
हालांकि, आज के दौर में मजदूरों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हैं। आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के कारण कई पारंपरिक नौकरियां खत्म हो रही हैं।
‘गिग इकॉनमी’ के बढ़ते चलन ने डिलीवरी एजेंट और फ्रीलांसरों के रूप में एक नया
श्रमिक वर्ग पैदा किया है, जिनके पास काम की आजादी तो है, लेकिन सामाजिक
सुरक्षा और पेंशन का अभाव है। कोरोना महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों का पलायन
इस बात का प्रमाण था कि बिना पुख्ता सुरक्षा तंत्र के मजदूरों का जीवन कितना
असुरक्षित हो सकता है। वास्तव में, मजदूर देश के विकास की असली धुरी हैं
और उन्हें सम्मान व सुरक्षा देना ही राष्ट्र की सच्ची उन्नति है।