प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा है
कि यदि किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति के नाम से बुलाया जाता है और ऐसा करने
के पीछे अपमान करने की कोई स्पष्ट मंशा नहीं है, तो इसे अनुसूचित जाति और
अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा
सकता। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसे मामलों में
कानूनी कार्यवाही जारी रखी जाती है, तो यह न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
कोर्ट ने यह टिप्पणी अमय पांडेय और तीन अन्य व्यक्तियों द्वारा दाखिल की गई अपील को
आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। उच्च न्यायालय ने अपीलार्थियों के खिलाफ
एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को तो रद कर दिया
है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि मारपीट और गाली-गलौज की अन्य धाराओं में दर्ज
मुकदमे नियमानुसार चलते रहेंगे। कोर्ट के अनुसार, वर्तमान मामले के आरोपों में
इस विशेष अधिनियम के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोजन का यह
प्राथमिक दायित्व है कि वह प्रथमदृष्टया साक्ष्यों के माध्यम से अपराध के होने को
साबित करे। इस मामले में अपीलार्थियों की ओर से अधिवक्ता गणेश शंकर श्रीवास्तव
और अश्वनी कुमार ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि शुरुआत में सिद्धार्थनगर जिले
की डुमरियागंज पुलिस द्वारा यह प्राथमिकी अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई
थी। उस प्रारंभिक रिपोर्ट में जातिगत आधार पर अपमानित करने का कोई जिक्र नहीं था।
अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि बाद में धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में कहानी
बदल दी गई और यह आरोप जोड़ा गया कि एक शादी समारोह के दौरान जाति सूचक शब्दों
का इस्तेमाल कर अपमानित किया गया था। हालांकि, इस दावे को साबित करने के लिए कोई
ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। यहां तक कि मेडिकल जांच रिपोर्ट भी अभियोजन
द्वारा बाद में बनाई गई कहानी का समर्थन नहीं करती है।
कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई तभी
प्रभावी होती है, जब अभियोजन यह साबित कर दे कि अभियुक्त ने पीड़ित को
जानबूझकर इसलिए अपमानित किया क्योंकि वह अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखता
है। साथ ही, ऐसा कृत्य किसी सार्वजनिक स्थान पर लोगों की मौजूदगी में होना
चाहिए।
अदालत ने पाया कि नंदन द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी या जांच के दौरान आए बयानों
में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह पता चले कि अमय पांडेय और अन्य का
इरादा शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करना था। केवल जाति का
नाम लेना, जब तक कि वह हीन भावना या आपराधिक आशय से न जुड़ा हो, इस कानून के
दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने अंततः विशेष अदालत द्वारा पुलिस चार्जशीट पर लिए गए
संज्ञान और जारी समन को एससी-एसटी एक्ट की हद तक अनुचित माना।