नई दिल्ली। बॉम्बे हाई कोर्ट ने दक्षिण मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी से जुड़े 20
करोड़ रुपये के मानहानि के मुकदमे में बेहद सख्त और अनोखा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने इस मामले की सुनवाई को अगले 22 वर्षों के लिए
टालते हुए इसे अब साल 2046 में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। यह मुकदमा
एक 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला और उनकी बेटी ने हाउसिंग सोसाइटी की प्रबंध समिति
के सदस्यों के खिलाफ दायर किया था।
इस विवाद की जड़ लगभग दस साल पुरानी है। सोसाइटी में मरम्मत और रखरखाव के लिए जमा
किए जाने वाले फंड को लेकर सदस्यों के बीच मतभेद पैदा हुआ था। विवाद तब और
अधिक बढ़ गया जब सोसाइटी की एक बैठक के दौरान महिला को ‘डिफॉल्टर’ यानी बकाया
न चुकाने वाला घोषित कर दिया गया और इसे बैठक के आधिकारिक रिकॉर्ड (मिनट्स) में
भी दर्ज किया गया। खुद को डिफॉल्टर कहे जाने से नाराज बुजुर्ग महिला ने इसे
अपनी प्रतिष्ठा पर चोट माना और प्रबंध समिति के सदस्यों के खिलाफ मानहानि
का मुकदमा दर्ज करा दिया।
हाई कोर्ट ने इस मामले को सुलझाने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए दोनों पक्षों
को समझौता करने का सुझाव दिया था। 20 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति
जितेंद्र जैन ने कहा था कि यदि मामले को आसानी से सुलझाया जा सकता है, बशर्ते
प्रतिवादी पक्ष बिना शर्त माफी मांग ले। मंगलवार को जब यह मामला दोबारा सुनवाई के
लिए आया, तो प्रबंध समिति के पूर्व सदस्यों की ओर से उनके वकीलों ने अदालत को
सूचित किया कि वे बिना शर्त माफी मांगने के लिए तैयार हैं।
अदालत के इस प्रयास और विपक्षी पक्ष के झुकने के बावजूद 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला
अपने रुख पर अड़ी रहीं। उन्होंने समझौता करने के हर प्रस्ताव को ठुकरा दिया और
मुकदमे को कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ाने पर जोर दिया। महिला के इस अड़ियल
रवैये को देखते हुए अदालत ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। न्यायमूर्ति जितेंद्र
जैन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वे इस मामले में अब और कुछ नहीं कहना
चाहते, सिवाय इसके कि इस केस को अगले 20 वर्षों तक सुनवाई के लिए न रखा जाए।
अदालत ने अपने एक पन्ने के आदेश में टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला उन उदाहरणों
में से एक है जहाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके लोगों के बीच ‘अहंकार की
लड़ाई’ न्यायिक प्रणाली को जाम कर रही है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों
की जिद के कारण उन महत्वपूर्ण मुद्दों को प्राथमिकता देने में बाधा आती है, जिन्हें
वास्तव में न्यायिक समय और ध्यान की अधिक आवश्यकता है। इसी आधार पर अदालत ने इस
मुकदमे की अगली तारीख सीधे वर्ष 2046 के लिए तय कर दी है।
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