भुवनेश्वर। ओडिशा में राज्यसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, राज्य का सियासी तापमान अपने चरम पर पहुंच गया है। 16 मार्च को होने वाले मतदान के लिए अब उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और राजनीतिक दलों के बीच ‘क्रॉस वोटिंग’ को लेकर जबरदस्त खौफ देखा जा रहा है। राज्यसभा की चार सीटों के लिए मैदान में पांच उम्मीदवारों के उतरने से मुकाबला बेहद दिलचस्प और पेचीदा हो गया है। इस कठिन परिस्थिति में सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, कोई भी दल अपने विधायकों पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहा है। विधायकों की ‘बाड़ेबंदी’ और उन्हें एकजुट रखने की जद्दोजहद इस समय ओडिशा की राजनीति का मुख्य केंद्र बन गई है।
बीजेडी की पाठशाला और छह विधायकों की रहस्यमयी अनुपस्थिति
बीजू जनता दल (बीजेडी) ने अपने कुनबे को बिखरने से बचाने के लिए नवीन निवास में एक विशेष ‘पाठशाला’ का आयोजन किया। इस प्रशिक्षण बैठक का मुख्य उद्देश्य विधायकों को राज्यसभा चुनाव की जटिल मतदान प्रक्रिया के बारे में समझाना और उन्हें एकजुट रखना था। हालांकि, पार्टी के लिए चिंता की बात तब सामने आई जब पाठशाला के पहले ही दिन छह विधायकों ने इससे दूरी बना ली। कुल विधायकों में से केवल 42 ही बैठक में उपस्थित हुए।
अनुपस्थित रहने वाले विधायकों में सौभिक बिस्वाल, नव मलिक, सुदर्शन हरिपाल, शारदा नायक, मनोहर रंधारी और चक्रमणि कहार के नाम शामिल हैं। हालांकि पार्टी के कुछ सूत्रों का दावा है कि मनोहर रंधारी अस्वस्थ हैं और शारदा नायक यात्रा के कारण समय पर नहीं पहुंच सके, लेकिन अन्य चार विधायकों की चुप्पी ने सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है। बीजेडी के भीतर यह डर घर कर गया है कि कहीं ये विधायक मतदान के दिन पार्टी लाइन से हटकर ‘क्रॉस वोटिंग’ न कर दें।
भाजपा की घेराबंदी और होटल रणनीति
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी किसी भी प्रकार का जोखिम लेने के मूड में नहीं है। भाजपा ने अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए पारादीप के एक होटल में शिफ्ट कर दिया है। पार्टी की रणनीति यह है कि सभी विधायक एक साथ एक ही स्थान पर रहें ताकि मतदान के दिन उन्हें सीधे विधानसभा ले जाया जा सके। भाजपा नेतृत्व इस बार तीन सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए गणित भिड़ाने में लगा है। इसके लिए लगातार रणनीतिक बैठकें की जा रही हैं। चार सीटों पर पांच प्रत्याशियों की मौजूदगी ने भाजपा को अतिरिक्त सतर्क रहने पर मजबूर कर दिया है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि इस चुनाव में एक-एक वोट की कीमत स्वर्ण के समान है और जरा सी चूक भारी पड़ सकती है।
कांग्रेस की रिसॉर्ट राजनीति और बेंगलुरु का सफर
ओडिशा कांग्रेस में भी तनाव का स्तर काफी ऊंचा है। अपनी संभावित टूट को रोकने के लिए कांग्रेस ने ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ का सहारा लिया है। पार्टी के आठ विधायकों को विशेष रूप से बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में ठहराया गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भक्त दास स्वयं इन विधायकों के साथ मौजूद हैं। इन विधायकों की निगरानी की जिम्मेदारी कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को सौंपी गई है, जिन्हें संकट के समय विधायकों को एकजुट रखने का विशेषज्ञ माना जाता है।
बेंगलुरु पहुंचने वाले विधायकों की सूची में सीएस राजन एक्का, अशोक दास, प्रफुल्ल प्रधान, मंगु खिल, पवित्र संउता, अपाला स्वामी, नीलमाधव हिक्का और सत्यजीत गमांग के नाम शामिल हैं। हालांकि, कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उसके छह अन्य विधायक बेंगलुरु नहीं गए हैं। इन विधायकों का पार्टी के साथ न जाना ओडिशा कांग्रेस के भीतर किसी बड़ी फूट का संकेत दे रहा है। पार्टी नेतृत्व भले ही एकजुटता का दावा कर रहा हो, लेकिन बेंगलुरु न जाने वाले विधायकों के रुख ने पार्टी की संभावनाओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
घोड़ा-बाजार और क्रॉस वोटिंग की आशंका
ओडिशा के राजनीतिक गलियारों में इस समय ‘घोड़ा-बाजार’ यानी हॉर्स ट्रेडिंग की चर्चाएं जोरों पर हैं। पांचवें उम्मीदवार की मौजूदगी ने मुकाबले को खुला छोड़ दिया है, जिससे निर्दलीय और छोटे दलों के साथ-साथ असंतुष्ट विधायकों की पूछ बढ़ गई है। सभी दलों को डर है कि विरोधी पक्ष उनके विधायकों को प्रलोभन देकर अपनी ओर खींच सकता है। बीजेडी, भाजपा और कांग्रेस, तीनों ही दल इस समय ‘डिफेंसिव’ मोड में हैं। 16 मार्च को होने वाला मतदान केवल राज्यसभा सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह ओडिशा के प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए अपनी ताकत और एकजुटता को साबित करने की अग्निपरीक्षा बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग होती है, तो इसका असर राज्य की भविष्य की राजनीति पर भी पड़ेगा। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजेडी के लिए अपने छह विधायकों की अनुपस्थिति का जवाब ढूंढना एक बड़ी चुनौती है, वहीं कांग्रेस और भाजपा के लिए अपने दूर गए विधायकों को वापस लाना प्राथमिक कार्य बन गया है। अब पूरी नजर 16 मार्च के घटनाक्रम पर टिकी है, जब मतदान पेटी खुलेगी और यह साफ होगा कि किस दल की रणनीति सफल रही और कौन अपने कुनबे को बचाने में नाकाम रहा।
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