Himachal: हिमाचल भाजपा में दलबदलुओं को तरजीह देने से बढ़ा असंतोष और अपनों ने ही फूंका बगावत का बिगुल

शिमला। हिमाचल प्रदेश के मंडी संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में भारतीय भाजपा के भीतर अंतर्कलह और असंतोष की लहर तेज होती जा रही है। पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि हाईकमान ने बाहरी दलों से आए नेताओं को न केवल पार्टी में शामिल किया, बल्कि उन्हें चुनाव में टिकट देकर पुराने दिग्गजों को हाशिये पर धकेल दिया। इस स्थिति ने कई क्षेत्रों में बगावत की स्थिति पैदा कर दी है, जिससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

लाहुल स्पीति में आपसी लड़ाई का कांग्रेस को मिला लाभ
लाहुल स्पीति विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के भीतर की दरार सबसे पहले और स्पष्ट रूप से सामने आई। यहां पार्टी ने अपने पुराने दिग्गज और पूर्व मंत्री रामलाल मार्कंडेय को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। उनकी जगह कांग्रेस से आए रवि ठाकुर को टिकट थमाया गया। पार्टी के इस फैसले से रामलाल मार्कंडेय इतने आहत हुए कि उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता की परवाह न करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। भाजपा के भीतर की इस आपसी खींचतान और वोटों के बिखराव का सीधा लाभ कांग्रेस को मिला। परिणाम यह रहा कि कांग्रेस की अनुराधा राणा ने इस हलके में जीत दर्ज कर ली और भाजपा को अपनी ही आपसी लड़ाई के कारण यह महत्वपूर्ण सीट गंवानी पड़ी। यह मामला पार्टी के लिए एक सबक की तरह उभरा है कि कैसे अपनों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।

कुल्लू के हलकों में राजपरिवार और कार्यकर्ताओं का टकराव
कुल्लू जिले के विभिन्न हलकों में भी टकराव की स्थिति लगातार बनी हुई है। यहां पूर्व सांसद महेश्वर सिंह का परिवार पार्टी नेतृत्व की अनदेखी से काफी समय से नाराज चल रहा है। इस नाराजगी का सीधा असर चुनावी मैदान में देखने को मिला जब महेश्वर सिंह के बेटे हितेश्वर सिंह ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के समझाने के बावजूद बंजार क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने का साहसी कदम उठाया। यह कदम पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ।

इसके अलावा, आनी विधानसभा क्षेत्र में भी स्थिति कुछ अलग नहीं रही। वहां भाजपा ने अपने पूर्व विधायक किशोरी लाल का टिकट काटकर लोकेंद्र कुमार को चुनावी मैदान में उतारा। लोकेंद्र कुमार की पृष्ठभूमि वामपंथी राजनीति की रही है, जिसके कारण स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता और मतदाता उन्हें अपना नेता स्वीकार करने में हिचक रहे हैं। बाहरी विचारधारा के व्यक्ति को थोपे जाने से स्थानीय संगठन में असंतोष की जड़ें और गहरी हो गई हैं।

मंडी और द्रंग में हाशिये पर पुराने दिग्गज
मंडी संसदीय क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी पुराने कार्यकर्ताओं का दर्द साफ तौर पर छलक रहा है। मंडी सदर क्षेत्र की बात करें तो 2017 के चुनाव के दौरान भाजपा ने पंडित सुखराम परिवार को अपने पाले में कर लिया था। इस रणनीतिक फैसले ने उन भाजपा नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाए हुए थे। पुराने कार्यकर्ताओं को लगता है कि नए आए लोगों ने उनकी मेहनत पर कब्जा कर लिया है।

द्रंग क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां जवाहर ठाकुर ने कई वर्षों तक पार्टी को मजबूत करने के लिए जमीन पर पसीना बहाया था। हालांकि जवाहर ठाकुर खुद भी पूर्व में कांग्रेस और हिविकां जैसे दलों का हिस्सा रह चुके हैं, लेकिन पार्टी के प्रति उनकी हालिया वफादारी को नजरअंदाज किया गया। पिछले चुनाव में पार्टी ने उन्हें किनारे कर पूर्ण चंद ठाकुर को टिकट थमा दिया। पूर्ण चंद ठाकुर तीन बार मंडी जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे, ऐसे में एक पुराने कांग्रेसी को भाजपा का चेहरा बनाना स्थानीय कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया और उन्होंने इसे अपनी मेहनत का अपमान माना।

जोगेंद्रनगर और सरकाघाट में बगावत की नई सुगबुगाहट
जोगेंद्रनगर हलके की कहानी भी दलबदल और अपनों की अनदेखी की दास्तां बयां करती है। यहां प्रकाश राणा ने पहले एक निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। साल 2022 में भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया, जिसका सीधा और नकारात्मक असर पूर्व मंत्री गुलाब सिंह ठाकुर के राजनीतिक भविष्य पर पड़ा। गुलाब सिंह ठाकुर जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता को पार्टी में किनारे कर दिए जाने से उनके समर्थकों में भारी नाराजगी और रोष देखा जा रहा है।

असंतोष की यह ज्वाला अब सरकाघाट तक भी पहुंच चुकी है। हाल ही में भाजपा के कई असंतुष्ट नेताओं ने सरकाघाट के पूर्व विधायक कर्नल इंद्र सिंह के निवास स्थान पर जाकर उनसे मुलाकात की। हालांकि इस मुलाकात को कर्नल इंद्र सिंह के घुटने की सर्जरी के बाद उनका कुशलक्षेम जानने का एक शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन असलियत में वहां चाय की चुस्कियों के साथ काफी देर तक राजनीतिक भविष्य पर गंभीर चर्चा हुई। कर्नल इंद्र सिंह ने स्पष्ट किया है कि वे निजी कारणों से भविष्य में चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन उनके नेतृत्व में असंतुष्ट नेताओं की यह बैठक पार्टी के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। असंतुष्ट नेताओं का एक बड़ा धड़ा अब कर्नल इंद्र सिंह के मार्गदर्शन में अपनी अगली रणनीति बनाने में जुटा है।

मंडी संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले इन सभी इलाकों में भाजपा के भीतर दलबदलुओं की ‘घुसपैठ’ ने एक बड़े असंतोष को जन्म दिया है। पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने इन पुराने और वफादार योद्धाओं को मनाने और संगठन में फिर से तालमेल बिठाने की है। यदि समय रहते इस अंतर्कलह को नहीं सुलझाया गया, तो आने वाले चुनावों में भाजपा को अपने ही घर में अपनों की बगावत का कड़ा सामना करना पड़ सकता है। दलबदलुओं को तरजीह देने की यह नीति पार्टी के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो रही है।

 

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