नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादी हिंसा के विरुद्ध जारी सुरक्षा बलों के अभियान को एक और बड़ी और निर्णायक सफलता मिली है। क्षेत्र में संचालित ‘पूना मारगेम : पुनर्वास से पुनर्जीवन’ पहल के तहत बुधवार को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) से जुड़े कुल 108 माओवादी कैडरों ने हिंसा का मार्ग त्याग कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पण करने वाले इन माओवादियों पर सामूहिक रूप से 3.95 करोड़ रुपये का बड़ा इनाम घोषित था। यह घटनाक्रम बस्तर में माओवादी नेटवर्क के लिए एक तगड़ा झटका माना जा रहा है।
इस महत्वपूर्ण समर्पण कार्यक्रम का आयोजन बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर स्थित लालबाग के शौर्य भवन और पुलिस कोआर्डिनेशन सेंटर में दोपहर दो बजे किया गया। इस समारोह में समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों, केंद्रीय सुरक्षा बलों के वरिष्ठ नेतृत्व और जिला प्रशासन के प्रतिनिधियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी उपस्थित जनों की मौजूदगी में माओवादी कैडरों ने औपचारिक रूप से हथियार डाले और एक सामान्य नागरिक के तौर पर जीवन जीने का संकल्प लिया।
जिलों के अनुसार समर्पण का विवरण
आत्मसमर्पण करने वाले 108 माओवादियों का विस्तार बस्तर संभाग के विभिन्न संवेदनशील जिलों में फैला हुआ था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 37 नक्सली बीजापुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। इसके अलावा दंतेवाड़ा से 30, सुकमा से 18 और बस्तर जिले से 16 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है। नारायणपुर जिले के 4 और कांकेर के 3 नक्सलियों ने भी इस सामूहिक आत्मसमर्पण में हिस्सा लिया। इन कैडरों में कई ऐसे सदस्य भी शामिल हैं जो लंबे समय से संगठन की सक्रिय गतिविधियों में शामिल थे और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने हुए थे।
हथियारों और विस्फोटकों की बड़ी बरामदगी
पुलिस अधिकारियों ने जानकारी दी है कि समर्पण करने वाले इन कैडरों से पूछताछ के दौरान मिली गुप्त सूचनाओं के आधार पर सुरक्षा बलों ने एक व्यापक ऑपरेशन चलाया। इसके परिणामस्वरूप माओवादी विरोधी अभियानों के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी ‘डंप बरामदगी’ की गई है। बीजापुर सहित बस्तर रेंज के विभिन्न घने जंगलों में नक्सलियों द्वारा छिपाकर रखे गए भारी मात्रा में हथियार, शक्तिशाली विस्फोटक और अन्य युद्धक सामग्रियां बरामद की गई हैं। इन सामग्रियों को जगदलपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शित भी किया गया, जो माओवादियों की घटती ताकत और सुरक्षा बलों की बढ़ती पैठ को दर्शाता है।
मुख्यधारा में लौटने का बढ़ता रुझान
पिछले कुछ वर्षों में बस्तर अंचल में माओवादी संगठन को लगातार संगठनात्मक और रणनीतिक मोर्चे पर विफलताओं का सामना करना पड़ा है। सरकार की आकर्षक समर्पण और पुनर्वास नीति ने माओवादियों के बीच गहरा प्रभाव डाला है। पुलिस द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों के भीतर ही 2700 से अधिक माओवादी कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। इनमें कई ऐसे शीर्ष नेता और इनामी सदस्य भी शामिल हैं, जो कभी संगठन की रीढ़ माने जाते थे। शासन की इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व माओवादियों को न केवल तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, बल्कि उनके सुरक्षित आवास, कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण और स्थायी रोजगार के अवसर भी सुनिश्चित किए जा रहे हैं।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘पूना मारगेम’ जैसी जमीनी स्तर की पहलों ने नक्सलियों के भीतर वैचारिक बदलाव लाने का काम किया है। निरंतर दबाव और विकास कार्यों के कारण संगठन की कैडर शक्ति और सूचना तंत्र तेजी से बिखर रहा है। ग्रामीण इलाकों में सरकार की बढ़ती पहुंच और सुरक्षा बलों के मानवीय व्यवहार ने नक्सलियों के प्रति स्थानीय समर्थन को कम किया है, जिससे संगठन के भीतर हताशा बढ़ी है।
पिछले एक वर्ष के बड़े आत्मसमर्पणों पर एक नजर
बस्तर में समर्पण का यह सिलसिला पिछले एक साल से काफी तेज हुआ है, जिसके मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं:
31 मार्च 2025 को बीजापुर में 50 कैडरों ने हथियार डाले। इसके बाद 24 सितंबर 2025 को दंतेवाड़ा में 71 नक्सलियों ने मुख्यधारा को चुना। अक्टूबर 2025 का महीना माओवादी संगठन के लिए विशेष रूप से भारी रहा, जब 3 अक्टूबर को बीजापुर में 103 नक्सलियों ने सरेंडर किया और 9 अक्टूबर को 16 अन्य सदस्यों ने हथियार छोड़े। 17 अक्टूबर 2025 को राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा समर्पण हुआ, जिसमें केंद्रीय समिति सदस्य सतीश उर्फ रूपेश के साथ 210 कैडरों ने एक साथ आत्मसमर्पण किया। इसके बाद 26 नवंबर 2025 को सुकमा और नारायणपुर में 43 और 5 फरवरी 2026 को बीजापुर में 12 अन्य नक्सलियों ने सरेंडर किया। यह अभियान केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि 7 मार्च 2026 को तेलंगाना में भी 130 कैडरों ने राज्य के मुख्यमंत्री के समक्ष समर्पण कर हिंसा का परित्याग किया।
यह ताजा सामूहिक समर्पण बस्तर में शांति बहाली की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। शासन और सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि 108 साथियों को मुख्यधारा में लौटता देख जंगलों में अभी भी सक्रिय अन्य कैडर भी जल्द ही हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास की राह पर आगे बढ़ेंगे।
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