नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने निजी एयरलाइंस द्वारा हवाई किरायों और अन्य संबंधित शुल्कों में की जाने वाली मनमानी बढ़ोतरी पर कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को सूचित किया कि नागर विमानन मंत्रालय इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए सक्रियता से विचार कर रहा है। यह मामला एक जनहित याचिका के जरिए उठाया गया है, जिसमें विमानन कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए गए हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिका में उठाए गए बिंदुओं को अत्यंत गंभीर बताया। अदालत ने केंद्र सरकार को इन विषयों पर गंभीरता से विचार करने और किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। पीठ ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला आम जनता की चिंता से जुड़ा है और यदि यह गंभीर नहीं होता, तो अदालत इस तरह की याचिकाओं को स्वीकार नहीं करती।
अदालत में केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक पेश हुए। उन्होंने बेंच को बताया कि संबंधित मंत्रालय इस समय हवाई किरायों और संबद्ध शुल्कों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न विकल्पों पर सक्रियता से विचार-विमर्श कर रहा है। मंत्रालय को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए कम से कम तीन सप्ताह के समय की आवश्यकता है। अदालत ने सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 मार्च की तारीख तय की है।
इससे पहले 19 जनवरी को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने त्योहारों, छुट्टियों और आपात स्थितियों के दौरान निजी एयरलाइंस द्वारा किरायों में की जाने वाली बेतहाशा वृद्धि को यात्रियों का ‘शोषण’ करार दिया था। उस दौरान अदालत ने केंद्र सरकार और नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) से इस लूट पर लगाम लगाने के लिए जवाब तलब किया था। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 17 नवंबर को इस संबंध में केंद्र, डीजीसीए और भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण को नोटिस जारी कर उनकी राय मांगी थी।
यह पूरा मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायण द्वारा दायर की गई एक याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता की कमी और यात्रियों के हितों की अनदेखी का आरोप लगाया है। याचिका में मांग की गई है कि हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र और शक्तिशाली नियामक (रेगुलेटर) का गठन किया जाना चाहिए। याचिका के अनुसार, निजी कंपनियां मांग बढ़ने पर मनमाने ढंग से किराया बढ़ा देती हैं, जिससे आम नागरिक और विशेष रूप से आपात स्थिति में यात्रा करने वाले लोग आर्थिक बोझ तले दब जाते हैं। अब सबकी नजरें 23 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार अपनी कार्ययोजना अदालत के समक्ष पेश करेगी।
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