नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय पहल ‘गाजा पीस बोर्ड’ को इसकी पहली बड़ी बैठक से पहले ही गहरा झटका लगा है। आगामी 19 फरवरी को होने वाली इस उच्चस्तरीय बैठक से पहले दुनिया के कई शक्तिशाली देशों ने इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। ट्रंप ने वैश्विक शांति और गाजा के पुनर्निर्माण का खाका खींचने के लिए करीब 60 देशों को आधिकारिक निमंत्रण भेजा था, लेकिन यूरोपीय देशों के कड़े रुख ने इस पहल की सफलता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और स्वीडन जैसे प्रमुख राष्ट्रों ने इस बैठक से किनारा कर लिया है, जो अमेरिकी कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
यूरोप में ट्रंप की इस शांति योजना को बहुत कम समर्थन मिलता दिख रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने यूरोप के 15 देशों को इस बैठक का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन अभी तक केवल तीन देशों ने ही आने की पुष्टि की है। इनमें हंगरी, बुल्गारिया और कोसोवो शामिल हैं। पश्चिमी यूरोप के देशों की इस बेरुखी ने वाशिंगटन में बेचैनी बढ़ा दी है क्योंकि बैठक शुरू होने में अब केवल दो दिन का समय शेष रह गया है। इन देशों का मानना है कि इस बोर्ड की कार्यप्रणाली और उद्देश्यों पर अभी और अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2026 के अंत में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन की घोषणा की थी। ट्रंप का तर्क है कि यह मंच न केवल युद्धग्रस्त गाजा के पुनर्निर्माण कार्यों की बारीकी से निगरानी करेगा, बल्कि भविष्य में दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले संघर्षों और विवादों के समाधान में भी एक निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इसे लेकर अभी संशय में है, जिसका असर वर्तमान में होने वाली बैठक की भागीदारी पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
एशियाई देशों के मोर्चे पर स्थिति थोड़ी अलग नजर आ रही है। ट्रंप ने इस क्षेत्र से पाकिस्तान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कजाकिस्तान जैसे देशों को न्योता भेजा है। ताजा जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान और इंडोनेशिया ने इस बैठक में अपनी भागीदारी के सकारात्मक संकेत दिए हैं। हालांकि, खाड़ी के दो महत्वपूर्ण खिलाड़ियों, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने अभी तक इस बैठक में शामिल होने को लेकर अपनी आधिकारिक सहमति नहीं दी है।
दुनिया की अन्य महाशक्तियों जैसे भारत, चीन और जापान ने भी फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। इन देशों ने बैठक में शामिल होने या न होने को लेकर अब तक कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की है। ट्रंप के लिए यह बैठक उनकी वैश्विक साख और विदेश नीति की सफलता को सिद्ध करने का एक बड़ा अवसर थी, लेकिन यूरोपीय सहयोगियों की अनुपस्थिति ने इसकी चमक को फीका कर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 19 फरवरी को होने वाली इस बैठक में ट्रंप अपनी योजना को कितनी मजबूती से रख पाते हैं।
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