बीजिंग। दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक मानी जाने वाली चीनी सेना के भीतर इन दिनों गहरा संकट और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। चीन की सत्ता पर पिछले लगभग 14 वर्षों से काबिज शी चिनफिंग ने अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करने के लिए न केवल सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में बड़े फेरबदल किए हैं, बल्कि सेना के शीर्ष स्तर पर भी व्यापक स्तर पर जनरलों की छंटनी शुरू कर दी है। सेना के जनरलों और एडमिरलों के खिलाफ की जा रही इन कठोर कार्रवाइयों के पीछे मुख्य कारण गहरा संदेह और आंतरिक खतरा बताया जा रहा है। चीनी रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में सार्वजनिक किया है कि सेना के दो सबसे वरिष्ठ अधिकारी, जनरल झांग यूशिया और एसोसिएट जनरल लियू झेनली, गंभीर उल्लंघनों के आरोपों में जांच के दायरे में आ चुके हैं।
यह घटनाक्रम वैश्विक राजनीति के लिए इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि झांग यूशिया को शी चिनफिंग का अत्यंत वफादार और करीबी सहयोगी माना जाता था। पिछले तीन वर्षों के दौरान चीनी सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में जो बदलाव हुए हैं, वे देश के इतिहास में अब तक के सबसे असाधारण बदलाव कहे जा रहे हैं। एक विश्लेषण के अनुसार, चिनफिंग ने वर्ष 2022 में केंद्रीय सैन्य आयोग के भीतर छह जनरलों की नियुक्ति की थी, लेकिन वर्तमान में उनमें से केवल एक अधिकारी को छोड़कर शेष सभी को उनके पदों से हटा दिया गया है। वर्ष 2023 की शुरुआत तक चीन के विभिन्न थिएटर कमांड और विशेष अभियानों की जिम्मेदारी संभालने वाले लगभग 30 जनरल और एडमिरल थे, जिनमें से अब लगभग सभी या तो बर्खास्त किए जा चुके हैं या वे रहस्यमयी तरीके से लापता हो गए हैं।
इन व्यापक कदमों ने दुनिया की सबसे बड़ी सेना के नेतृत्व में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है। झांग यूशिया जैसे उच्च पदस्थ अधिकारियों के विरुद्ध जिस तरह के आरोप सामने आ रहे हैं, वे अत्यंत गंभीर हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, सैन्य अधिकारियों के बीच यह चर्चा है कि झांग अमेरिकी सरकार के लिए जासूसी कर रहे थे और उन्होंने परमाणु खुफिया जानकारी जैसी संवेदनशील सूचनाएं साझा की थीं। चिनफिंग ने जब 2012 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया था, तभी से उन्होंने ‘भ्रष्टाचार रोधी अभियान’ की आड़ में इस तरह की सफाई प्रक्रिया शुरू कर दी थी। 2013 में राष्ट्रपति बनने के बाद से उन्होंने इस अभियान के माध्यम से विरोधियों को रास्ते से हटाकर खुद को दशकों में देश के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित कर लिया है।
तानाशाही प्रवृत्तियों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि चिनफिंग की इन कार्रवाइयों के पीछे सत्ता खोने का गहरा डर और असुरक्षा की भावना छिपी हो सकती है। जर्मन राजनीतिक विश्लेषक मार्सेस डिर्सस के अनुसार, ऐसे शक्तिशाली नेताओं को बाहरी प्रदर्शनकारियों या राजनीतिक विरोधियों से उतना खतरा महसूस नहीं होता, जितना कि उन्हें अपने ही करीबी सहयोगियों से लगता है। उनका तर्क है कि एक शक्तिशाली नेता हमेशा इस आशंका में जीता है कि उसके चारों ओर खतरा मंडरा रहा है। वह कभी भी यह पूरी तरह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि उसके साथ खड़े अधिकारियों में से कौन वास्तव में वफादार है और कौन विश्वासघात करने की योजना बना रहा है। यही संदेह उसे अपने करीबियों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है।
अमेरिकी खुफिया विश्लेषकों का भी यही आकलन है कि चिनफिंग हाल के वर्षों में अत्यधिक आशंकित रहने लगे हैं। हालांकि इन हालिया सैन्य कार्रवाइयों के पीछे अभी तक कोई एक ठोस और स्पष्ट आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह राजनीतिक चुनौती से स्वयं को बचाने का एक प्रयास हो सकता है। इसके अलावा, सेना के शीर्ष स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना भी चिनफिंग की प्राथमिकता रही है, ताकि सेना की युद्धक क्षमता और उन पर उनका नियंत्रण बना रहे।
चीनी सेना के भीतर चल रही यह उथल-पुथल न केवल चीन की आंतरिक सुरक्षा बल्कि वैश्विक सामरिक संतुलन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां चीन अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर दुनिया को डराना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसकी सेना के भीतर नेतृत्व का यह संकट उसकी आंतरिक कमजोरी को भी दर्शाता है। शी चिनफिंग द्वारा अपने ही नियुक्त किए गए वफादारों को हटाना यह साबित करता है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी सत्ता पर आंच नहीं आने देना चाहते। यह देखना दिलचस्प होगा कि सैन्य नेतृत्व में पैदा हुए इस खालीपन को चिनफिंग किस तरह भरते हैं और आने वाले समय में उनके इस ‘संदेह’ का शिकार और कौन से अधिकारी बनते हैं। फिलहाल, चीनी सेना के भीतर मचे इस हड़कंप ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
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