नई दिल्ली 27 जनवरी 2026। आज का दिन भारत और यूरोपीय संघ के कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाला है। मंगलवार, 27 जनवरी को दोनों पक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं। इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी चर्चा लंबे समय से वैश्विक आर्थिक गलियारों में हो रही थी। हालांकि, भारत और यूरोपीय संघ की इस बढ़ती नजदीकी ने संयुक्त राज्य अमेरिका को खासा परेशान कर दिया है। वाशिंगटन इस पूरी डील पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है और उसकी ओर से इस पर कड़ी प्रतिक्रिया भी सामने आई है।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इस व्यापारिक संधि को लेकर यूरोपीय संघ को सीधे तौर पर चेतावनी जारी की है। बेसेंट का कहना है कि भारत के साथ इस तरह की डील साइन करके यूरोपीय संघ वास्तव में अपने ही खिलाफ एक तरह की जंग का एलान कर रहा है। अमेरिका का मानना है कि यह समझौता यूरोपीय हितों के लिए भविष्य में घातक साबित हो सकता है। बेसेंट ने बेहद कड़े लहजे में कहा कि यूरोप इस डील के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उन ताकतों को आर्थिक मजबूती प्रदान कर रहा है, जो वर्तमान वैश्विक व्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
अमेरिकी नाराजगी के पीछे एक बड़ा कारण ऊर्जा संबंधों से जुड़ा है। स्कॉट बेसेंट ने तर्क दिया कि हालांकि यूरोप ने रूस के साथ अपने प्रत्यक्ष ऊर्जा संबंधों को काफी हद तक समाप्त कर दिया है, लेकिन वह अब भी भारत के माध्यम से रूसी तेल उत्पादों की खरीद कर रहा है। अमेरिका का आरोप है कि भारत में रिफाइन किए गए रूसी तेल उत्पादों को खरीदकर यूरोपीय देश रूस-यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंड दे रहे हैं। बेसेंट ने इस बात पर जोर दिया कि एक तरफ वाशिंगटन ने नई दिल्ली पर विभिन्न प्रकार के टैरिफ लगाए हैं ताकि आर्थिक दबाव बनाया जा सके, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर इस दबाव को कम करने का काम कर रहा है।
अमेरिकी प्रशासन का यह भी मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को सुलझाने और शांति बहाल करने की दिशा में डोनल्ड ट्रंप ने जो प्रयास किए हैं, उनमें अमेरिका ने यूरोपीय संघ की तुलना में कहीं अधिक बलिदान दिया है। बेसेंट ने दावा किया कि अमेरिका ने इस युद्ध के आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों को कम करने के लिए बड़ी कीमत चुकाई है, जबकि यूरोपीय संघ अब अपने व्यापारिक लाभ को प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिका की यह कड़वाहट स्पष्ट करती है कि वह भारत और यूरोप के बीच होने वाले इस बड़े आर्थिक गठजोड़ को अपने वैश्विक प्रभाव के लिए एक चुनौती मान रहा है।
व्यापारिक आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में यूरोपीय संघ और भारत के बीच लगने वाले आयात शुल्क में काफी विसंगतियां हैं। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, यूरोपीय संघ भारत से आने वाले सामानों, विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों के उत्पादों पर लगभग 10 प्रतिशत का टैक्स वसूलता है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यह कर केवल 3.8 प्रतिशत के आसपास होना चाहिए। इसी प्रकार, भारत भी यूरोपीय वस्तुओं पर औसतन 9.3 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाता है। भारत में यूरोपीय ऑटोमोबाइल और उनके पुर्जों पर सबसे अधिक 35.5 प्रतिशत का भारी-भरकम टैक्स लगता है, जबकि प्लास्टिक उत्पादों पर यह दर 10.4 प्रतिशत है।
आज होने वाली इस बड़ी ट्रेड डील से यह उम्मीद की जा रही है कि अधिकांश वस्तुओं पर लगने वाले इन भारी टैक्स को या तो पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा या फिर उनमें बड़ी कटौती की जाएगी। इससे न केवल दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार की मात्रा बढ़ेगी, बल्कि उपभोक्ताओं को भी सस्ते उत्पादों का लाभ मिलेगा। भारत और यूरोपीय संघ ने इस समझौते के लिए अपनी वार्ताओं को अंतिम रूप दे दिया है और आज होने वाली औपचारिक घोषणा वैश्विक बाजार के समीकरणों को बदलने की क्षमता रखती है। अमेरिका की चेतावनियों के बावजूद, भारत और यूरोपीय संघ इस दिशा में दृढ़ता से आगे बढ़ रहे हैं। यह समझौता आने वाले दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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