नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलाने की मंशा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। इस मुद्दे के कारण अमेरिका और उसके सबसे पुराने सहयोगियों में शुमार यूरोपीय देशों के बीच दशकों पुराने रिश्तों में कड़वाहट आनी शुरू हो गई है। ट्रंप की इस विस्तारवादी योजना को कई यूरोपीय देशों ने सिरे से खारिज कर दिया है, जिससे पश्चिमी देशों के बीच एक बड़ी वैचारिक और रणनीतिक खाई पैदा हो गई है। इस गंभीर संकट के बीच ‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ (नाटो) के प्रमुख मार्क रूट्टे का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसने यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है।
मार्क रूट्टे ने यूरोपीय नेतृत्व को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिकी सैन्य शक्ति और सहायता के बिना यूरोप अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने उन नेताओं को आईना दिखाने की कोशिश की जो अमेरिका से अलग हटकर अपनी स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्था बनाने का दावा कर रहे हैं। रूट्टे के अनुसार, “यदि यहाँ किसी को भी ऐसा लगता है कि यूरोपीय संघ या पूरा यूरोप मिलकर बिना अमेरिका की मदद के खुद की सुरक्षा कर सकता है, तो वह केवल सपनों की दुनिया में रह रहा है। हकीकत यह है कि आप ऐसा नहीं कर सकते। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में यूरोप और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की समान रूप से जरूरत है।”
नाटो प्रमुख ने यूरोप की सैन्य कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि यूरोप सच में अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता खत्म करना चाहता है, तो उसे अपनी पूरी रक्षा नीति और वित्तीय ढांचे को बदलना होगा। मार्क रूट्टे ने सुझाव दिया कि इसके लिए पूरे यूरोप को अपना वर्तमान रक्षा बजट कम से कम दोगुना करना होगा। उन्होंने याद दिलाया कि जुलाई 2025 में हेग में हुए नाटो सम्मेलन के दौरान सभी सदस्य देशों ने अपनी जीडीपी का 3.5 प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर खर्च करने का संकल्प लिया था, जिसे 2035 तक बढ़ाकर 5 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था।
हालांकि, मार्क रूट्टे ने स्पष्ट किया कि जीडीपी का 5 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने के बाद भी यूरोप किसी भी कीमत पर सैन्य शक्ति के मामले में अमेरिका की बराबरी नहीं कर पाएगा। उनके विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका के समकक्ष खड़े होने के लिए यूरोप को अपनी जीडीपी का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा रक्षा बजट में झोंकना होगा। इसके साथ ही यूरोप को एक शक्तिशाली परमाणु संपन्न शक्ति के रूप में विकसित होना होगा, जिसके लिए उसे अरबों यूरो का अतिरिक्त निवेश करना पड़ेगा। बिना इतने बड़े आर्थिक बलिदान के अमेरिका के बिना सुरक्षा की कल्पना करना निरर्थक है।
इस पूरे विवाद की जड़ में डोनल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान है। ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क का हिस्सा है, जो खुद नाटो का एक सक्रिय सदस्य देश है। दूसरी ओर, अमेरिका भी नाटो का सबसे शक्तिशाली और नेतृत्वकर्ता सदस्य है। डोनल्ड ट्रंप ने उन यूरोपीय देशों को सीधे तौर पर आर्थिक परिणाम भुगतने की धमकी दी है जो उनके ग्रीनलैंड मिशन का समर्थन नहीं कर रहे हैं। ट्रंप ने साफ कहा है कि विरोध करने वाले देशों पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाए जाएंगे।
नाटो में कुल 32 देश शामिल हैं और यह संगठन सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर काम करता है। नाटो के अनुच्छेद 5 के अनुसार, किसी भी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। ऐसे में ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर अपनाया गया अड़ियल रुख और डेनमार्क की संप्रभुता के प्रति उपेक्षा ने नाटो के भीतर ही एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। मार्क रूट्टे का यह बयान उसी दबाव का परिणाम है, जहाँ वे यूरोप को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि अमेरिका से शत्रुता पालना उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। फिलहाल, ग्रीनलैंड के मुद्दे ने नाटो की एकता और यूरोप की भविष्य की सुरक्षा रणनीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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