US: ग्रीनलैंड विलय की डोनल्ड ट्रंप की योजना पर अमेरिकी सांसदों ने ही फेरा पानी

नई दिल्ली। सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलाने की राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की महात्वाकांक्षी योजना को अपने ही घर में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ जहां डोनल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए लगातार धमकियां दे रहे हैं और दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं। इस मुद्दे पर अमेरिका की सत्ताधारी पार्टी में पड़ी फूट ने डोनल्ड ट्रंप के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी की स्थिति पैदा कर दी है।

विवाद इस कदर बढ़ गया है कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों का एक साझा 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ग्रीनलैंड पहुंच गया है। इस दल का मुख्य उद्देश्य डेनमार्क और ग्रीनलैंड के शीर्ष नेताओं से मुलाकात करना और उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त करना है कि अमेरिकी संसद ग्रीनलैंड की स्वायत्तता और संप्रभुता के पक्ष में खड़ी है। इस दल में थॉम टिलिस और लीजा मुर्कोवस्की जैसे प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर भी शामिल हैं, जो सीधे तौर पर अपनी ही सरकार की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं।

डोनल्ड ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व अमेरिका की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। इसके साथ ही, आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद प्रचुर खनिज संपदा पर भी अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर है। इसी खनिज भंडार और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लेने के लिए बल प्रयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया है। ट्रंप के इस रुख ने न केवल अमेरिका के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी हलचल पैदा कर दी है।

डेनमार्क के विशेष आग्रह पर कुछ यूरोपीय देशों ने एहतियात के तौर पर छोटी संख्या में अपने सैन्य बल भी तैनात कर दिए हैं ताकि किसी भी संभावित अप्रिय स्थिति का सामना किया जा सके। डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स के नेतृत्व में गया अमेरिकी दल अब डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस फ्रेडरिक नील्सन से मुलाकात कर रहा है। क्रिस कून्स ने एक आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया कि वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के समय में अमेरिका को अपने पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों के करीब रहने की आवश्यकता है, न कि उन्हें खुद से दूर धकेलने की।

न्यू हैम्पशायर की सीनेटर जीन शाहीन, जो विदेश संबंध समिति की सदस्य भी हैं, ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि ग्रीनलैंड को जबरन कब्जे में लेने की चर्चाओं से उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की वैश्विक छवि को गहरा धक्का लगा है। शाहीन के अनुसार, डोनल्ड ट्रंप के इस कदम से दुनिया भर में यह संदेश गया है कि अमेरिका अनजाने में रूस और चीन जैसी शक्तियों के हाथों में खेल रहा है, जो पश्चिमी देशों के बीच दरार पैदा करना चाहते हैं।

इस बीच, डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्सफेल्ट ने भी जवाबी कूटनीति तेज कर दी है। वे जल्द ही अमेरिका के अन्य सांसदों से मुलाकात कर ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता के पक्ष में समर्थन जुटाएंगे। डोनल्ड ट्रंप के लिए सबसे चिंताजनक बात जनमत का रुझान है। रॉयटर्स और इप्सोस द्वारा कराए गए एक हालिया सर्वेक्षण में सामने आया है कि केवल 17 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही ग्रीनलैंड पर कब्जे के ट्रंप के विचार का समर्थन करते हैं। बहुमत की राय और अपनी ही पार्टी के सांसदों का विद्रोह डोनल्ड ट्रंप की इस विस्तारवादी योजना के लिए एक बड़ी बाधा बन गया है। अब देखना यह है कि आंतरिक दबाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी इस जिद को आगे बढ़ाते हैं या उन्हें पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ेगा।

 

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