शिमला। हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में अब शिक्षकों और गैर-शिक्षक कर्मचारियों के विरुद्ध आने वाली शिकायतों को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकेगा। विभाग ने एक बड़ा प्रशासनिक सुधार करते हुए यह सुनिश्चित करने का निर्णय लिया है कि शिकायतों की न केवल समय पर जांच शुरू हो, बल्कि एक निश्चित समय सीमा के भीतर उनका निस्तारण भी किया जाए। इस नई व्यवस्था के तहत विभाग राज्य के प्रत्येक जिले में 10-10 प्रधानाचार्यों का एक विशेष पैनल गठित करने जा रहा है।
इस नई प्रणाली की कार्यप्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक प्रधानाचार्य के साथ जांच कार्य में सहयोग हेतु अधीक्षक ग्रेड-2 श्रेणी के एक गैर-शिक्षक कर्मचारी को भी तैनात किया जाएगा। शिक्षा विभाग इन चयनित पैनल सदस्यों को जांच की बारीकियों और नियमों से संबंधित विशेष प्रशिक्षण भी प्रदान करेगा। स्कूल शिक्षा विभाग के निदेशक आशीष कोहली ने इस संबंध में सभी जिलों के उप-निदेशकों को पत्र जारी कर योग्य प्रधानाचार्यों के नाम भेजने के निर्देश दिए हैं। एक बार पैनल तैयार हो जाने के बाद, जिला स्तर पर जितने भी पुराने और नए जांच के मामले लंबित हैं, उन्हें इसी पैनल को सौंप दिया जाएगा।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में शिक्षा विभाग के पास कुल 75 जांच के मामले लंबित हैं। इनमें से कई मामले तो ऐसे हैं जो पिछले कई वर्षों से फाइलों में दबे हुए हैं और उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यह कदम शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के कड़े निर्देशों के बाद उठाया गया है। हाल ही में रोहित ठाकुर की अध्यक्षता में विभाग की एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें लंबित जांच मामलों की धीमी प्रगति पर उन्होंने गहरा असंतोष व्यक्त किया था। शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों की नियमित निगरानी होनी चाहिए ताकि न्याय प्रक्रिया में देरी न हो। रिपोर्ट के अनुसार चंबा, कांगड़ा, मंडी, शिमला, सोलन और सिरमौर जिलों में जांच के सबसे अधिक मामले लंबित पाए गए हैं।
विभाग के पास आने वाली शिकायतों की प्रकृति काफी विस्तृत है। इनमें मुख्य रूप से अधिकारियों या शिक्षकों का अभद्र व्यवहार, वित्तीय अनियमितताएं, सरकारी धन का दुरुपयोग, आवंटित बजट को सही तरीके से खर्च न करना और मिड-डे मील (एमडीएम) के कार्यों में गड़बड़ी जैसी शिकायतें शामिल हैं। इसके अलावा विभाग की सामान्य कार्यप्रणाली और कर्मचारियों के अनुशासन से जुड़ी शिकायतें भी अक्सर आती रहती हैं, जो समय पर जांच न होने के कारण लंबित रह जाती हैं।
जांच प्रक्रिया में अब समय की पाबंदी को अनिवार्य बनाया गया है। यदि किसी गंभीर शिकायत के आधार पर किसी कर्मचारी को निलंबित किया जाता है, तो जांच अधिकारी के लिए 90 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट सौंपना अनिवार्य होगा। इस रिपोर्ट के आधार पर ही संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल करने या सेवा से बर्खास्त करने जैसी अगली कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। वहीं अन्य सामान्य मामलों में जांच पूरी करने के लिए एक से तीन महीने का समय निर्धारित किया गया है।
इसके साथ ही, शिक्षा विभाग इस समय भारी कानूनी बोझ से भी जूझ रहा है। विभाग से संबंधित लगभग आठ हजार से अधिक मामले विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं। इनमें से अधिकांश मामले कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची, वेतनमान विसंगतियों, पदोन्नति और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभों से जुड़े हुए हैं। कई मामले तो इतने पुराने हैं कि संबंधित शिक्षक सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं, लेकिन उनके कानूनी विवाद अब भी जारी हैं। इन अदालती मामलों के प्रबंधन के लिए स्कूल शिक्षा निदेशालय में एक समर्पित लीगल ब्रांच कार्य कर रही है। नई व्यवस्था से विभाग को उम्मीद है कि आंतरिक शिकायतों का निपटारा समय पर होने से भविष्य में कानूनी विवादों की संख्या में भी कमी आएगी।
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