चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत दाखा विधानसभा क्षेत्र से शिरोमणि अकाली दल के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने मंगलवार को औपचारिक रूप से ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ संगठन में शामिल होने की घोषणा की है। इस नए राजनीतिक सफर की शुरुआत करते हुए अयाली ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी शर्त के बिना इस संगठन के साथ जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि उनका प्राथमिक लक्ष्य पंजाब की बंटी हुई पंथक ताकतों को एक साझा मंच पर वापस लाना है, ताकि राज्य और धर्म से जुड़े हितों की रक्षा की जा सके।
विधायक पद से इस्तीफे की संभावनाओं पर स्थिति साफ करते हुए मनप्रीत सिंह अयाली ने कहा कि वे फिलहाल अपने पद से त्यागपत्र नहीं देंगे। इसके पीछे उन्होंने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए बताया कि चूंकि ‘वारिस पंजाब दे’ अभी केवल एक संगठन के रूप में कार्यरत है और निर्वाचन आयोग के पास एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत नहीं है, इसलिए उनके लिए विधायक पद छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। तकनीकी रूप से वे सदन में अभी भी शिरोमणि अकाली दल के प्रतिनिधि के रूप में ही बने रहेंगे।
प्रेस से रूबरू होते हुए अयाली ने पंजाब की अस्मिता और पंथक मुद्दों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पंजाब, पंजाबियत और पंथक हितों के लिए संघर्ष को और तेज करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार पंजाब के पानी का अधिकार, पंजाबी भाषी क्षेत्रों का विलय और चंडीगढ़ पर राज्य का हक जैसे कई ज्वलंत मुद्दे लंबे समय से अनसुलझे पड़े हैं। इन विषयों को अब वे संगठन के माध्यम से मजबूती से उठाएंगे। उन्होंने यह भी साझा किया कि वे पिछले एक साल से इस संगठन की गतिविधियों में सक्रिय थे और उनके निर्वाचन क्षेत्र की जनता भी उन्हें पंथक राजनीति को सशक्त करने के लिए इस मंच से जुड़ने की सलाह दे रही थी।
राजनीतिक गठबंधन के सवाल पर मनप्रीत सिंह अयाली ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वे आज भी सभी पंथक धड़ों के बीच एकता और समझौते के समर्थक हैं, लेकिन चुनाव के लिहाज से भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों के साथ किसी भी प्रकार का गठबंधन नहीं किया जाएगा। खालिस्तान के विषय पर उन्होंने अपनी नीति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी पूरी लड़ाई लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में रहकर लड़ी जाएगी।
शिरोमणि अकाली दल के वर्तमान ढांचे पर सवाल उठाते हुए अयाली ने अकाल तख्त द्वारा बनाई गई पुनर्गठन समिति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सुधार की इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया। उन्होंने मांग की कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के चुनाव जल्द से जल्द कराए जाने चाहिए, ताकि जनता खुद यह तय कर सके कि वास्तविक अकाली दल कौन है। अयाली ने आरोप लगाया कि राज्य के लोगों की नाराजगी अकाली दल की मूल विचारधारा से नहीं है, बल्कि एक विशेष परिवार के वर्चस्व से है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि वह परिवार नेतृत्व से पीछे हट जाए, तो अकाली दल के सभी बिखरे हुए धड़े फिर से एक हो सकते हैं।
इसी अवसर पर खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने अपने बेटे की निरंतर हिरासत पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनएसए हटने के बावजूद अमृतपाल सिंह को रिहा नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डिब्रूगढ़ जेल में बंद उनके बेटे को जनता ने भारी बहुमत से जिताया है, फिर भी उन्हें न तो संसद में बोलने दिया जा रहा है और न ही वे अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा कर पा रहे हैं। तरसेम सिंह ने पंजाब में फैलते नशे के जाल पर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि सरकारें इस गंभीर समस्या को नजरअंदाज कर रही हैं, जिससे राज्य की जवानी बर्बाद हो रही है। इस नए राजनीतिक तालमेल से पंजाब के आगामी सियासी समीकरणों में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा रही है।