नई दिल्ली। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है। रविवार को ‘ओवर द काउंटर’ बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 10 प्रतिशत का जबरदस्त उछाल देखा गया और यह लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों ने गंभीर आशंका जताई है कि यदि यह तनावपूर्ण स्थिति जल्द नहीं संभली, तो कच्चे तेल के दाम जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर सकते हैं।
इस अचानक आई तेजी के पीछे केवल सैन्य हमले ही नहीं, बल्कि ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) को लेकर दी गई चेतावनी को मुख्य कारण माना जा रहा है। ईरान ने विदेशी जहाजों को इस मार्ग से गुजरने के खिलाफ सख्त हिदायत दी है। इसके बाद दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों और प्रमुख ट्रेडिंग हाउसेस ने इस रास्ते से होने वाली कच्चे तेल, ईंधन और एलएनजी (तरल प्राकृतिक गैस) की शिपमेंट को फिलहाल रोक दिया है। उल्लेखनीय है कि वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऊर्जा विश्लेषक अजय परमार के अनुसार, सैन्य हमलों से अधिक इस रणनीतिक मार्ग का बंद होना कीमतों को अनियंत्रित कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में कीमतें 100 डॉलर के बेहद करीब खुल सकती हैं। आरबीसी की विश्लेषक हेलिमा क्राफ्ट ने भी चेतावनी दी है कि पश्चिमी एशिया में युद्ध की स्थिति तेल कीमतों को ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले जा सकती है। हालांकि, स्थिति को संभालने के लिए ओपेक प्लस देशों ने अप्रैल से तेल उत्पादन में करीब 2,06,000 बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी करने पर सहमति जताई है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि यह वृद्धि वैश्विक मांग के 0.2% से भी कम है, जो बाजार में स्थिरता लाने के लिए नाकाफी साबित हो सकती है।
भारत के संदर्भ में राहत की बात यह है कि वर्तमान में तेल आपूर्ति पर तत्काल कोई बड़ा संकट नजर नहीं आ रहा है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के पास वर्तमान में 10 से 15 दिनों का कच्चा तेल भंडार सुरक्षित है। इसके अलावा, देश के पास करीब एक सप्ताह की ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। यदि होर्मुज मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है, तो भारत अपने आयात स्रोतों में बदलाव कर रूस, वेनेजुएला, ब्राजील और अफ्रीकी देशों से तेल की खरीद बढ़ा सकता है।
हालांकि, कच्चे तेल की तुलना में एलएनजी की आपूर्ति भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है। अधिकारियों के मुताबिक, एलएनजी के अनुबंध अक्सर लंबी अवधि के नहीं होते और मौजूदा बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित है। ऐसे में यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है, तो देश की गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। फिलहाल, भारत सरकार और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
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