इस्लामाबाद।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश की जर्जर आर्थिक स्थिति और विदेशी मदद पर निर्भरता को लेकर एक बेहद कड़वा सच स्वीकार किया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह माना है कि दुनिया के तमाम देशों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाने से न केवल राष्ट्र का सम्मान कम होता है, बल्कि इसके लिए भारी ‘इज्जत की कीमत’ भी चुकानी पड़ती है। शहबाज शरीफ का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान का कर्ज ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है और देश का हर नागरिक लाखों रुपये के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।
सोशल मीडिया पर शहबाज शरीफ का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसमें वे देश की बेबसी का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि विदेशी शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से कर्ज मांगते समय पाकिस्तान को कई ऐसी शर्तें माननी पड़ती हैं, जो देश के स्वाभिमान के खिलाफ होती हैं। शरीफ ने कहा कि कर्ज देने वाले देश अक्सर अपनी इच्छाएं थोपते हैं और न चाहते हुए भी पाकिस्तान को उन समझौतों पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब कोई देश आर्थिक मदद मांगने जाता है, तो उसका सिर झुका हुआ होता है और देने वाला हमेशा ऊंचे स्थान पर रहता है।
इस वीडियो में शहबाज शरीफ ने यह भी खुलासा किया कि वे स्वयं और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर कई देशों के दौरे पर गए ताकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक विदेशी मुद्रा का इंतजाम किया जा सके। उन्होंने बताया कि कई मित्र देशों ने उन्हें आर्थिक मदद देने से मना तो नहीं किया, लेकिन कर्ज लेने की इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान की वैश्विक साख और गरिमा को चोट पहुंचाई है। उन्होंने इसे एक ऐसी मजबूरी बताया जिसमें देश को अपनी जरूरतों के लिए दूसरों की शर्तों के आगे झुकना पड़ता है।
पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली के आंकड़े बेहद डरावने हैं। ताजा राजकोषीय नीति रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति कर्ज का बोझ पिछले एक साल में 13 प्रतिशत तक बढ़ गया है। वर्तमान में हर पाकिस्तानी नागरिक पर औसतन 3.33 लाख रुपये का कर्ज है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा लगभग 2.94 लाख रुपये था, जो अब और भी भयावह हो चुका है। दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज 52.366 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है।
शहबाज शरीफ का यह कबूलनामा दर्शाता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अब उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां से वापसी का रास्ता बेहद कठिन है। कर्ज के इस दुष्चक्र ने देश के विकास को पूरी तरह से बाधित कर दिया है। प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि कर्ज के बदले में उन्हें कई बार ऐसे कूटनीतिक और आर्थिक निर्णय लेने पड़े जिन्हें वे सामान्य परिस्थितियों में कभी स्वीकार नहीं करते। यह स्थिति न केवल पाकिस्तान की आंतरिक संप्रभुता के लिए खतरा है, बल्कि उसकी वैश्विक छवि को भी ‘भिखारी देश’ के रूप में स्थापित कर रही है। आने वाले समय में पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस कर्ज के जाल से बाहर निकलना और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाना होगा, जो फिलहाल नामुमकिन नजर आता है।
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