देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में शिक्षा विभाग की एक बड़ी लापरवाही के विरुद्ध जिला प्रशासन ने अब निर्णायक कार्रवाई शुरू कर दी है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षों से सैंकड़ों बच्चे ऐसे जर्जर स्कूल भवनों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर थे, जिनकी छतें और दीवारें कभी भी गिर सकती थीं। कई स्कूलों की छतों से सरिया बाहर निकल आया था और बरसात के समय कमरों में पानी टपकने के बावजूद वहां कक्षाएं संचालित की जा रही थीं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कड़े निर्देशों के बाद जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस संवेदनशील मुद्दे पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई, जिसके बाद शिक्षा तंत्र में हड़कंप मच गया है।
प्रशासन की इस सक्रियता का परिणाम यह रहा कि जो जर्जर भवन रिपोर्ट वर्षों से विभागीय फाइलों में दबी हुई थी, वह महज 10 दिनों के भीतर तैयार कर सार्वजनिक कर दी गई। जिला प्रशासन द्वारा कराए गए सघन सर्वेक्षण में 100 स्कूलों की स्थिति का बारीकी से परीक्षण किया गया। इस जांच के परिणाम अत्यंत चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिले के 79 विद्यालय भवन पूरी तरह से ‘निष्प्रोज्य’ यानी रहने या बैठने के लिए अनुपयुक्त पाए गए हैं। इन खतरनाक भवनों में 66 प्राथमिक और 13 माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं। ये वे इमारतें हैं जहां बच्चों को बिठाना उनकी जान को जोखिम में डालने के समान था।
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि 17 अन्य विद्यालय भवन आंशिक रूप से जर्जर हैं, जिनकी तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है। केवल 8 स्कूल भवन ही वर्तमान में पूरी तरह सुरक्षित पाए गए हैं। जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए तत्काल ध्वस्तीकरण के आदेश जारी कर दिए हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जिन 63 स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पहले ही सुनिश्चित की जा चुकी है, वहां भवनों को गिराने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी। शेष 16 विद्यालयों के लिए पहले सुरक्षित स्थान और वैकल्पिक शिक्षण व्यवस्था का प्रबंध किया जाएगा, उसके बाद ही वहां के पुराने ढांचों को ध्वस्त किया जाएगा।
ध्वस्तीकरण और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षात्मक कार्य करने के लिए जिला प्रशासन ने एक करोड़ रुपये की विशेष धनराशि स्वीकृत की है। इसके साथ ही लोक निर्माण विभाग को निर्देशित किया गया है कि वे सात दिन के भीतर इन कार्यों का तकनीकी आंगणन तैयार कर प्रस्तुत करें। सविन बंसल ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अब किसी भी स्थिति में जोखिमपूर्ण और जर्जर भवनों के भीतर शिक्षण कार्य संचालित नहीं होने दिया जाएगा।
यह पूरी कार्रवाई न केवल जर्जर इमारतों को हटाने के लिए है, बल्कि उस सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है जिसने मासूमों की सुरक्षा को लंबे समय तक नजरअंदाज किया। पिछले पांच से दस वर्षों से जर्जर हालत में पड़े इन स्कूलों की समय पर रिपोर्टिंग न होना और मामूली मरम्मत के नाम पर लीपापोती करना शिक्षा विभाग और निर्माण एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी को दर्शाता है। यदि जिलाधिकारी स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप न करते, तो शायद ये खतरनाक भवन कभी सामने नहीं आते।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि प्रशासन के लिए बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने आश्वासन दिया कि पूरी प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। इस मुहिम ने यह साबित कर दिया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो वर्षों से लटके हुए सुरक्षा संबंधी कार्यों को भी कुछ ही दिनों में अमलीजामा पहनाया जा सकता है। फिलहाल, ध्वस्तीकरण की तैयारी के साथ ही देहरादून के इन स्कूलों के कायाकल्प की नई उम्मीद जगी है।