Himachal: कुल्लू दशहरा में दिखेगा देव आस्था और वैश्विक संस्कृति का संगम – The Hill News

Himachal: कुल्लू दशहरा में दिखेगा देव आस्था और वैश्विक संस्कृति का संगम

कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में बुधवार से धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और विभिन्न देशों की सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलेगी। सात दिवसीय इस आयोजन में राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। उत्सव के पहले दिन भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं का मिलन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहेगा। इस वर्ष उत्सव में भाग लेने के लिए 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है।

दशहरा उत्सव समिति ने इस बार पिछले वर्ष की तुलना में अधिक देवी-देवताओं को आमंत्रित किया है। वर्ष 2025 में 332 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया था। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू भी 26 अक्टूबर को उत्सव में शामिल होंगे। आयोजन के दौरान धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक संध्याएं भी आयोजित की जाएंगी, जिनमें देश-विदेश के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

366 साल पुरानी है देव निमंत्रण की परंपरा

कुल्लू दशहरा में देवी-देवताओं को आमंत्रित करने की परंपरा वर्ष 1660 में शुरू हुई थी। उस समय कुल्लू के राजा देवी-देवताओं को उत्सव में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजते थे। समय के साथ इस परंपरा की जिम्मेदारी प्रशासन के पास आ गई, लेकिन इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व आज भी बना हुआ है।

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में 304, वर्ष 2023 में 315, वर्ष 2024 में 317 और वर्ष 2025 में 274 देवी-देवताओं ने उत्सव में भाग लिया था। इस बार 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजे जाने से आयोजन में उनकी भागीदारी को लेकर विशेष उत्सुकता है।

पंजीकरण और नजराना राशि के लिए निर्धारित व्यवस्था

देवी-देवताओं की सूची में बदलाव करने का अधिकार देवी-देवता कारदार संघ के पास है। संघ की मंजूरी के बाद ही प्रशासन नए देवी-देवताओं के पंजीकरण पर विचार करता है। पंजीकृत देवी-देवताओं को निर्धारित नियमों के अनुसार नजराना राशि दी जाती है। कुछ देवी-देवता लंबे समय से उत्सव में शामिल नहीं हो रहे हैं, फिर भी उन्हें तय व्यवस्था के तहत राशि भेजी जाती है।

देवी-देवताओं को ऐतिहासिक राजस्व व्यवस्था के आधार पर माफीदार और गैर माफीदार श्रेणियों में बांटा गया है। जिन देवी-देवताओं के नाम पर भूमि थी और जिन्हें उस भूमि के राजस्व कर में छूट मिलती थी, उन्हें माफीदार कहा जाता था। वहीं, जिनकी भूमि पर राजस्व कर लिया जाता था, वे गैर माफीदार श्रेणी में आते थे। यह व्यवस्था कुल्लू की ऐतिहासिक परंपराओं का हिस्सा रही है।

1265 जवानों के जिम्मे सुरक्षा व्यवस्था

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पूरे आयोजन क्षेत्र में 1265 जवान तैनात रहेंगे। निगरानी के लिए 155 सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन की मदद ली जाएगी, ताकि भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखी जा सके।

सांस्कृतिक संध्याओं में इंडोनेशिया, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अमेरिका, रूस, थाईलैंड, मलेशिया, मिस्र, श्रीलंका और नेपाल के सांस्कृतिक दल हिस्सा लेंगे। उनकी प्रस्तुतियों से उत्सव को अंतरराष्ट्रीय रंग मिलेगा। धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपराओं और वैश्विक सांस्कृतिक भागीदारी के कारण कुल्लू दशहरा एक बार फिर देश-विदेश के लोगों के आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है।

 

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