SC: गंभीर चोट के मामले में दोषियों को बरी करने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज – The Hill News

SC: गंभीर चोट के मामले में दोषियों को बरी करने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दो दोषियों को लंबी कानूनी प्रक्रिया के आधार पर राहत देने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्याय करते समय आरोपियों को हुई परेशानी पर विचार करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ित की स्थिति और उसके साथ हुए नुकसान को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इस मामले में पीड़ित के दोनों हाथों की कार्यक्षमता काफी हद तक प्रभावित हुई है और उसे अब भी उपचार की जरूरत है।

मामला वर्ष 2003 का है। इस प्रकरण में ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल की जेल की सजा सुनाई थी। हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई में करीब 22 साल लगने और आरोपियों को लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के आधार पर उन्हें प्रोबेशन यानी परिवीक्षा का लाभ दे दिया। इसके चलते दोनों को जेल में एक दिन भी नहीं बिताना पड़ा।

गलत सहानुभूति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे गलत सहानुभूति का उदाहरण बताया। अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान पीड़ित के साथ हुए गंभीर नुकसान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। शीर्ष अदालत के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ित के अधिकारों और उसकी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि निचली अदालत से दोषसिद्धि और सजा मिलने के बावजूद मामला इस स्थिति तक कैसे पहुंचा कि आरोपियों को बिना जेल गए राहत मिल गई। पीठ ने कहा कि कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय न्याय के मूल उद्देश्य और अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

आरोपियों के आपराधिक रिकॉर्ड पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के चरित्र से संबंधित प्रतिकूल रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट में उनके कई आपराधिक मामलों में शामिल होने की बात सामने आई थी। पीठ ने सवाल किया कि ऐसी परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने उन्हें प्रोबेशन का लाभ देने का निर्णय किस आधार पर लिया।

अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमे में देरी निश्चित रूप से न्यायिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, लेकिन केवल लंबी सुनवाई को आरोपियों को राहत देने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। पीठ के अनुसार, जब आरोपी जमानत पर बाहर थे, तब उन्हें जेल में रहने जैसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा था। ऐसे में देरी के आधार पर राहत देने के फैसले पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।

हाई कोर्ट को दोबारा सुनवाई का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित के भाई की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपियों को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई करने को कहा है। इस आदेश के बाद दोषियों को दी गई राहत और सजा से जुड़े पहलुओं पर फिर से न्यायिक विचार किया जाएगा।

इस मामले ने एक बार फिर आपराधिक न्याय व्यवस्था में मुकदमों के निपटारे में होने वाली देरी और पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने के सवाल को सामने ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि न्याय करते समय आरोपी के अधिकारों के साथ-साथ पीड़ित की गरिमा, सुरक्षा और न्याय पाने के अधिकार को भी समान गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

 

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