वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में दिया गया भाषण कई विरोधाभासी संदेशों के कारण चर्चा में रहा। एक ओर ट्रंप ने अपने प्रशासन को आठ अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सुलझाने में सफल बताया, वहीं दूसरी ओर ईरान को लेकर बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी। 22 सितंबर को दिए संबोधन में उन्होंने ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने की संभावना को स्वीकार न करने की बात कही और समझौता नहीं होने की स्थिति में उसके खिलाफ बेहद कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी।
ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कंबोडिया-थाईलैंड, कोसोवो-सर्बिया, कांगो-रवांडा, आर्मेनिया-अजरबैजान और भारत-पाकिस्तान सहित कई संघर्षों को समाप्त कराने में भूमिका निभाई है। उन्होंने गाजा के संघर्ष का भी उल्लेख किया। ट्रंप ने इन घटनाक्रमों में अपने व्यक्तिगत संबंधों के साथ व्यापारिक दबाव और टैरिफ की धमकी को भी प्रभावी साधन बताया।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर फिर किया दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच 2025 में हुए सैन्य टकराव को समाप्त कराने का श्रेय खुद को दिया। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें ट्रंप की भूमिका के लिए धन्यवाद दिया गया और लाखों लोगों की जान बचने का दावा किया गया।
हालांकि भारत का आधिकारिक रुख इस दावे से अलग रहा है। भारतीय पक्ष ने लगातार कहा है कि मई 2025 में संघर्ष विराम दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों यानी डीजीएमओ के बीच सीधे संपर्क के बाद हुआ था। इसलिए ट्रंप के इस दावे को भारत की ओर से स्वीकार नहीं किया गया है।
ईरान को लेकर बदला तेवर
भाषण के दूसरे हिस्से में ट्रंप ने ईरान पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अमेरिका उसे परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। उन्होंने ईरान के सामने अमेरिका के साथ समझौते का विकल्प रखा और कहा कि समझौता नहीं होने पर उनका प्रशासन बेहद कठोर कदम उठा सकता है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के साथ समझौते की संभावना बन सकती है।
उन्होंने दुनिया के अन्य देशों से भी ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसके अलगाव में सहयोग करने का आह्वान किया। उनके भाषण में ईरान का परमाणु कार्यक्रम और मौजूदा संघर्ष प्रमुख मुद्दों में रहे।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी निशाना
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र के कामकाज और कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भी आलोचना की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी ICC को लेकर सदस्य देशों से उससे अलग होने का आह्वान किया। इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के जलवायु संबंधी एजेंडे और यूनेस्को को लेकर भी अपनी असहमति व्यक्त की।
ट्रंप ने जनवरी में बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का भी उल्लेख किया और बताया कि कई देश इसमें शामिल हो चुके हैं। उनके संबोधन में गाजा, यूक्रेन, वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषय भी शामिल रहे।
इस तरह ट्रंप के यूएन भाषण में एक तरफ संघर्षों को सुलझाने में अमेरिकी भूमिका का दावा प्रमुख रहा, तो दूसरी तरफ ईरान को लेकर सैन्य और आर्थिक दबाव की चेतावनी भी सामने आई। भाषण के इन दोनों पहलुओं ने उनकी विदेश नीति के अलग-अलग रुखों को एक ही मंच पर सामने रखा।
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