नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है। साहू ने गिरफ्तारी पर रोक लगाने और उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे को निरस्त करने की मांग की थी। न्यायमूर्ति आलोक महरा की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद याचिका खारिज करने का फैसला सुनाया।
यह मामला देहरादून के कैंट थाने में रेखा आर्य की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे से जुड़ा है। इसमें साहू के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120-बी, 323, 420, 467, 468, 471, 495, 498-ए, 504 और 506 के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
साहू के अधिवक्ताओं ने बताया घरेलू विवाद
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान साहू के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि दोनों पक्षों का विवाह जुलाई 2004 में हुआ था और वे करीब 22 वर्षों से साथ रह रहे हैं। बचाव पक्ष के अनुसार, यह मूल रूप से घरेलू विवाद है, जिसे अब आपराधिक मुकदमे का रूप दिया जा रहा है। इसी आधार पर गिरफ्तारी पर रोक और मुकदमा निरस्त करने की मांग की गई।
वहीं, रेखा आर्य की शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विवाह के समय साहू ने अपनी पहली शादी और बच्चों की जानकारी छिपाई थी। शिकायत के मुताबिक, बाद में अन्य महिलाओं से कथित संबंधों का विरोध करने पर उनके साथ मारपीट, गालीगलौज और जातिसूचक अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज तैयार कर उन्हें कंपनी के निदेशक पद से जबरन सेवानिवृत्त दिखाया गया, जबकि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया था। इसके अलावा एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला देते हुए कथित तौर पर उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश रचने और इसके लिए धन खर्च करने की बात कही गई है।
अदालत ने कहा, आरोप सामान्य वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं
राज्य सरकार के सरकारी अधिवक्ता और रेखा आर्य के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए आरोपों की गंभीरता का हवाला दिया। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग नहीं कर रहा है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले में लगाए गए आरोप केवल सामान्य वैवाहिक मनमुटाव तक सीमित नहीं हैं। इनमें शारीरिक प्रताड़ना, दस्तावेजों की कूट रचना, जातिसूचक अपमान और जान से मारने की कथित साजिश जैसे गंभीर संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया शामिल हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह को करीब 22 वर्ष बीत जाने मात्र से बाद में कथित रूप से हुए अपराधों या क्रूरता की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। ऑडियो रिकॉर्डिंग और कथित फर्जी दस्तावेजों की वास्तविकता जांच तथा मुकदमे के दौरान परखी जानी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भजनलाल और निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर मामलों में दिए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस स्तर पर अदालत मिनी-ट्रायल नहीं कर सकती। उपलब्ध रिकॉर्ड और आरोपों के आधार पर एफआईआर निरस्त करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया गया। इसी के साथ अदालत ने गिरधारी लाल साहू की याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने एक दिन पहले सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे अब सुनाया गया है। याचिका खारिज होने का अर्थ है कि इस स्तर पर एफआईआर निरस्त करने या गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की गई है। मामले की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।